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नन्होई नौला की वापसी: एक व्यक्ति के संकल्प से फिर बह उठा जीवन

शंकर बिष्ट का यह कार्य पहाड़ों के युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है — कि बदलाव लाने के लिए बड़े पद, धन या राजनीतिक ताकत की नहीं, बल्कि साफ नीयत और निरंतरता की जरूरत होती है।

चौखुटिया (अल्मोड़ा) — जब इंसान पूरी निष्ठा और धैर्य के साथ प्रकृति के पक्ष में खड़ा होता है, तो सूखी और बेजान धरती भी फिर से जीवन से भर उठती है। चौखुटिया क्षेत्र के निवासी शंकर बिष्ट ने यह बात अपने कर्म से सिद्ध कर दिखाई है।

यह कहानी है नन्होई नौले की—एक पारंपरिक जलस्रोत, जो वर्षों की उपेक्षा, जंगलों की कटाई और बदलते मौसम के प्रभाव के कारण लगभग सूख चुका था। कभी गांव की जीवनरेखा रहा यह नौला धीरे-धीरे इतिहास बनता जा रहा था।

साल 2022 में शंकर बिष्ट ने नन्होई नौले को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। यह कार्य आसान नहीं था। संसाधन सीमित थे, रास्ता लंबा था और परिणाम तुरंत दिखाई देने वाले नहीं थे। बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी।

तीन वर्षों तक लगातार मेहनत करते हुए उन्होंने जलस्रोत के आसपास के क्षेत्र में जंगलों की रक्षा की और 7000 से अधिक पौधों का रोपण किया। बांज, बुरांश, काफल, पय्यां और देवदार जैसे स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष लगाए गए, जिन्होंने मिट्टी को मजबूती दी, नमी को संरक्षित किया और वर्षाजल को जमीन में रोकने में अहम भूमिका निभाई।

इन प्रयासों का परिणाम आज सामने है। वर्षों से सूखा पड़ा नन्होई नौला फिर से बहने लगा है। यह केवल जलधारा की वापसी नहीं, बल्कि इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यदि प्रकृति को समय, सम्मान और संरक्षण दिया जाए, तो वह स्वयं अपना संतुलन पुनः स्थापित कर लेती है।

यह पहल इस मिथक को भी तोड़ती है कि संरक्षण केवल बड़ी योजनाओं और सरकारी परियोजनाओं से ही संभव है। वास्तव में बदलाव जमीनी स्तर पर, व्यक्तिगत जिम्मेदारी और निरंतर प्रयासों से आता है।

शंकर बिष्ट का यह कार्य पहाड़ों के युवाओं के लिए एक मजबूत संदेश है — कि बदलाव लाने के लिए बड़े पद, धन या राजनीतिक ताकत की नहीं, बल्कि साफ नीयत और निरंतरता की जरूरत होती है। यदि हर गांव में कोई एक व्यक्ति भी अपने प्राकृतिक संसाधनों की जिम्मेदारी ले ले, तो सूखते नौले, खाली होते गांव और टूटता सामाजिक भरोसा फिर से जुड़ सकता है।

आज नन्होई नौला सिर्फ पानी नहीं बहा रहा, बल्कि उम्मीद, आत्मनिर्भरता और पहाड़ों के भविष्य की संभावनाओं को भी प्रवाहित कर रहा है। यह कहानी याद दिलाती है कि प्रकृति कभी किसी का साथ नहीं छोड़ती—बस उसके लिए पहला ईमानदार कदम बढ़ाने की जरूरत होती है।

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Hill Mail

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