कांडपाल ने समस्या को बाहर से नहीं, भीतर से देखा। उन्होंने जाना कि पहाड़ों में पानी का संकट बारिश की कमी नहीं, पानी को सहेजने की परंपरा के टूटने का नतीजा है। बरसात की हर बूंद को रोकने, रिसने और धरती के भीतर जाने देने की समझ — यही उनकी कार्यपद्धति की बुनियाद बनी। वर्षों की मेहनत से खाल बने, परंपरागत नौले फिर से जागे और रिस्कन नदी, जिसे लोग लगभग भूल चुके थे, दोबारा बहने लगी।
यह काम किसी एक व्यक्ति का नहीं था। गांवों को साथ लेकर, स्थानीय ज्ञान को सम्मान देते हुए और श्रमदान की परंपरा को पुनर्जीवित कर यह पहल आगे बढ़ी। जहां सरकारी योजनाएं अक्सर कागजों में उलझ जाती हैं, वहां सामुदायिक भागीदारी ने काम को ज़मीन पर उतारा। जलग्रहण क्षेत्र का संरक्षण, ढलानों पर सही जगह पर छोटी संरचनाएं और वनस्पति का संवर्धन — इन सबने मिलकर जलचक्र को फिर से जीवित किया।

‘पानी बोओ’ उनके लिए महज़ नारा नहीं, पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा की सोच है। इस सोच ने गांवों में नई चेतना पैदा की — पानी अब खत्म होने वाली वस्तु नहीं, साझा जिम्मेदारी बना। नतीजा यह हुआ कि जलस्रोत लौटे तो खेती को सहारा मिला, पशुपालन मजबूत हुआ और पलायन की मजबूरी पर सवाल खड़े हुए। महिलाओं की रोज़मर्रा की मेहनत घटी, खेतों में भरोसा लौटा और गांवों में भविष्य की उम्मीद जगी।
आज देश ने इस शांत लेकिन असरदार प्रयास को मान्यता दी है। मोहन चंद्र कांडपाल को मिला छठा राष्ट्रीय जल पुरस्कार केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है जो कहता है कि समाधान स्थानीय हों, सहभागिता से हों और प्रकृति के साथ तालमेल में हों। यह कहानी नीति-निर्माताओं के लिए भी संकेत है — कि बड़े बजट से पहले छोटी, टिकाऊ और समुदाय-आधारित पहलें ज्यादा दूर तक असर करती हैं।
उत्तराखंड की यह पहल याद दिलाती है कि पहाड़ों का संकट पहाड़ों की समझ से ही सुलझेगा। जब हम परंपरा, विज्ञान और सामुदायिक इच्छाशक्ति को जोड़ते हैं, तब परिवर्तन न सिर्फ संभव होता है, वह टिकाऊ भी बनता है।
बदलाव सचमुच पहाड़ों से ही शुरू होता है।


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