मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने MoU को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि यह केवल एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि लंबे समय से प्रतीक्षित परियोजना को धरातल पर उतारने की दिशा में बड़ा कदम है। उन्होंने भारत सरकार और सभी सहभागी राज्य सरकारों का आभार जताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि किशाऊ परियोजना की परिकल्पना वर्ष 1940 में की गई थी। करीब आठ दशक के दौरान इसे आगे बढ़ाने के कई प्रयास हुए, लेकिन विभिन्न कारणों से परियोजना लंबित रही।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दशकों से अटकी महत्वपूर्ण परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के विशेष सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि 16 जून 2026 को हुई बैठक में किशाऊ परियोजना से जुड़ी कई महत्वपूर्ण अड़चनों के समाधान का मार्ग प्रशस्त हुआ। इसके बाद केंद्र और संबंधित राज्यों के बीच लगातार समन्वय से परियोजना की प्रक्रिया आगे बढ़ी और अब MoU के माध्यम से इसे औपचारिक रूप दिया गया है।
राष्ट्रीय महत्व की बहुउद्देशीय परियोजना
धामी ने कहा कि किशाऊ केवल बांध निर्माण की परियोजना नहीं है, बल्कि जल सुरक्षा, ऊर्जा उत्पादन, सिंचाई, पेयजल और यमुना के पुनर्जीवीकरण से जुड़ी राष्ट्रीय महत्व की बहुउद्देशीय योजना है। परियोजना के तहत करीब 1562 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) क्षमता का विशाल जलाशय विकसित होगा। इसके साथ 422 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता भी विकसित की जाएगी।
परियोजना का लाभ उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान को भी मिलेगा। इससे अपर यमुना बेसिन में जल उपलब्धता और सिंचाई व्यवस्था को मजबूती मिलने की उम्मीद है। साथ ही पेयजल और ऊर्जा क्षेत्र में भी दीर्घकालिक लाभ प्राप्त होंगे।
मुख्यमंत्री ने इसे अंतरराज्यीय सहयोग और सहकारी संघवाद का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्यों के सामूहिक प्रयासों से वर्षों से लंबित परियोजना अब आगे बढ़ रही है।
प्रभावित परिवारों का पुनर्वास प्राथमिकता
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि परियोजना के निर्माण के दौरान प्रभावित परिवारों का पुनर्वास राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। उन्होंने कहा कि विकास के साथ प्रभावित लोगों के हितों का संरक्षण भी आवश्यक है। सरकार उचित, संवेदनशील और सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
उन्होंने परियोजना के लिए आवश्यक वन भूमि को भी बड़ी चुनौती बताया। करीब 2500 हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण की आवश्यकता होगी, जिसके चलते क्षतिपूरक वनीकरण के लिए भी बड़ी मात्रा में भूमि चाहिए होगी। धामी ने केंद्र और सहभागी राज्यों से उत्तराखंड को इसके लिए आवश्यक भूमि चिन्हित करने में सहयोग देने का अनुरोध किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखते हुए सभी पर्यावरणीय एवं वन संबंधी प्रावधानों का नियमानुसार पालन करेगा।
उन्होंने विश्वास जताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और अमित शाह के मार्गदर्शन में सभी सहभागी राज्य ‘विकल्प रहित संकल्प’ के साथ किशाऊ परियोजना को समयबद्ध तरीके से धरातल पर उतारेंगे। MoU को उन्होंने ऐतिहासिक पड़ाव बताते हुए कहा कि इसके पूर्ण होने से आने वाली पीढ़ियों को जल, ऊर्जा, सिंचाई और पेयजल के क्षेत्र में दीर्घकालिक लाभ मिलेगा।


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