डॉ. पूरन चंद्र पांडे ने हाल ही में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय से विकास अध्ययन में अपनी 19वीं डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से एमबीए में 20वीं डिग्री हासिल करने के लिए प्रवेश का आवेदन किया है। उनका कहना है कि शिक्षा को केवल नौकरी या डिग्री हासिल करने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। अलग-अलग विषयों का अध्ययन व्यक्ति की सोच को व्यापक बनाता है और उसे समाज तथा जीवन की विभिन्न परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझने में मदद करता है।
उनका शैक्षणिक सफर वर्ष 1998 में पहली स्नातक डिग्री हासिल करने के साथ शुरू हुआ था। इसके बाद उन्होंने लगातार अलग-अलग विषयों में अध्ययन किया। कानून उनका प्रमुख पेशा रहा, लेकिन ज्ञान की खोज उन्हें कई अन्य विषयों तक ले गई। उन्होंने समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, मानवाधिकार, मनोविज्ञान, शिक्षा शास्त्र, राजनीति विज्ञान, इतिहास, हिंदी, योग, जनसंचार, दर्शनशास्त्र, ज्योतिष, पत्रकारिता तथा महात्मा गांधी एवं शांति अध्ययन जैसे विषयों का भी अध्ययन किया है।
कानून के क्षेत्र में भी डॉ. पांडे ने उच्च शिक्षा हासिल की है। उन्होंने एलएलबी और एलएलएम के साथ पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की है। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियों की खास बात यह है कि उन्होंने अलग-अलग संस्थानों से विभिन्न विषयों में डिग्रियां हासिल की हैं। उनकी उपाधियां कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, साबरमती विश्वविद्यालय गुजरात और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय हल्द्वानी से जुड़ी हैं।
डॉ. पांडे पेशे से अधिवक्ता हैं और कानून की जिम्मेदारियों के साथ-साथ अध्ययन, शोध और लेखन को भी जारी रखते हैं। उनका मानना है कि किसी भी विषय को गहराई से समझने के लिए निरंतर पढ़ना जरूरी है। यही वजह है कि उम्र बढ़ने के बावजूद उनकी पढ़ाई के प्रति रुचि लगातार बनी हुई है। 19 डिग्रियां हासिल करने के बाद भी उन्होंने खुद को अध्ययन से अलग नहीं किया, बल्कि अब 20वीं डिग्री की दिशा में कदम बढ़ा दिया है।
डॉ. पांडे की शैक्षणिक यात्रा की एक और खास उपलब्धि दैनिक जागरण से जुड़ी है। उनके अनुसार, उन्होंने दैनिक जागरण में विभिन्न सामाजिक और समसामयिक मुद्दों पर सबसे अधिक पत्र लिखे हैं। इसके लिए उनका नाम गिनीज बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज है। लेखन के माध्यम से भी वह लगातार समाज से जुड़े विषयों पर अपनी बात रखते रहे हैं।
उनकी कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणा है जो किसी उम्र के बाद पढ़ाई को रोक देना ही बेहतर समझते हैं। डॉ. पांडे का सफर बताता है कि शिक्षा केवल प्रमाणपत्र प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। अलग-अलग विषयों में अध्ययन ने उनके अनुभव और दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है।
अब उनकी नजर 20वीं डिग्री पर है। एमबीए के लिए आवेदन के बाद वह आगे की पढ़ाई की तैयारी कर रहे हैं। 50 वर्ष की उम्र में भी ज्ञान हासिल करने की उनकी यह ललक साबित करती है कि सीखने की कोई अंतिम सीमा नहीं होती। व्यक्ति यदि जिज्ञासु बना रहे तो उम्र उसके रास्ते में बाधा नहीं बनती।


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