शिक्षक भविष्य निर्माण करता है। यह बात जितनी सहज है, उतना ही मुश्किल है इसकेलिए निरंतर काम करना। लेकिन कई युवा शिक्षक हैं, जो उत्तराखंड में तमाम मुश्किलों के बावजूद इस धारा को नई गति दे रहे हैं।
हिल-मेल ब्यूरो, देहरादून
पहाड़ों के स्कूलों में जहां एक तरफ शिक्षकों और संसाधनों की कमी की शिकायतें आती रहती हैं, वहीं कुछ ऐसे भी शिक्षक हैं जो व्यवस्था से जुड़ी तमाम ख़ामियों के बावजूद बड़ी ही खूबसूरती से अपनी रचनात्मक भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे ही शिक्षकों पर तमाम बच्चों का भविष्य टिका है। इसीलिए शिक्षकों को समाज और राष्ट्र का निर्माता भी कहा जाता है।
कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर उत्तराखंड के एक शिक्षक के ट्रांसफर के बाद उनको दी गई विदाई की भावुक तस्वीरें वायरल हुईं थीं। दरअसल, ये तस्वीरें उत्तराखंड में शिक्षा की उस बदलती बयार का प्रतीक हैं, जिन्हें युवा शिक्षक ने रफ्तार दी है।
आशीष डंगवाल का उत्तरकाशी के राजकीय इंटर कॉलेज, भंकोली से तबादला हुआ। तो हर आंख नम हो आई। उनके तबादले के बाद स्कूल के बच्चों से लेकर गांव के अभिवावकों तक के छलके आंसुओं की तस्वीरें वायरल हुईं। ऐसा क्या था इन तस्वीरों में जो लोगों को इतना पसंद आया। क्या एक शिक्षक का उसके विद्यार्थियों के साथ ऐसा रिश्ता नहीं होता था। क्या एक शिक्षक का, उन विद्यार्थियों के अभिवावकों के साथ ऐसा रिश्ता नहीं रहता होगा।
आशीष खुद ही कहते हैं कि पहले भी ऐसे शिक्षक रहे होंगे जिनका अपने विद्यार्थियों के साथ लगाव होता होगा। हालांकि अब ऐसा कम ही होता है। पूरा गांव आपके जाने पर क्यों रो पड़ा, ये पूछने पर आशीष विनम्रता से कहते हैं कि ये मैं कैसे बताऊं, ये तो गांववाले ही बता सकते हैं। उनके पढ़ाने का तरीका ऐसा क्या था, कि बच्चे अपने गुरु जी से डरते नहीं थे, बल्कि उनके बगल में खड़े होकर तस्वीरें खिंचाते थे। आशीष कहते हैं कि आपको बच्चों से जुड़ना होता है। उनके बीच की झिझक तोड़नी होती है। उनसे बात करनी होती है। बच्चों की समस्याएं सुननी होती हैं। बच्चों से रिश्ता बनाना होता है। वो बताते हैं कि कक्षा में कुर्सी की जगह वो मेज़ पर बैठना पसंद करते थे, क्योंकि इससे वो हर बच्चे के करीब होते थे। हालांकि ये बात उनके साथियों को अखरती थी।
प्रवक्ता पद की परीक्षा पास करने के बाद आशीष का तबादल टिहरी हो गया है। इन वायरल तस्वीरों ने आशीष को अच्छी प्रसिद्धि दिला दी है। इसलिए वे अपनी जिम्मेदारी बढ़ी हुई महसूस करते हैं। वो कहते हैं कि मुझे प्रसिद्धि मिल गई लेकिन मैं इससे आगे बढ़कर शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बेहतर करना चाहता हूं। मैं अपनी सफलता में बच्चों को भी भागीदार बनाना चाहता हूं। इसलिए वे अपने मित्रों के साथ मिलकर कुछ ऐसा करने की योजना तैयार कर रहे हैं जिसमें बच्चों की मूलभूत समस्याओं पर काम किया जा सके।
सरकारी स्कूल और अंग्रेजी स्कूल के फर्क पर आशीष कहते हैं कि गांवों के लोग देखा-देखी बच्चों को पढ़ाने के नाम पर शहरों की ओर भाग रहे हैं। आप यदि सचिवालय या अन्य सरकारी दफ्तरों मे जाइये तो आपको ज्यादातर सरकारी स्कूल से पढ़कर निकले लोग ही मिलेंगे। किसी मॉल में जाइये तो वहां निजी स्कूलों से पढ़कर निकले लोग दिखेंगे जो सिर्फ अंग्रेजी के दम पर नौकरी हासिल करने की योग्यता रखते हैं। वे कहते हैं कि सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने के लिए सरकार और शिक्षकों के साथ लोगों को भी साथ आना होगा। उन्हें सरकारी स्कूलों और शिक्षकों पर भरोसा करना होगा।
आशीष कहते हैं कि ऐसे शिक्षक होंगे जो स्कूल नहीं जाते, या देर से जाते हैं, लेकिन ऐसे शिक्षक भी हैं जो बच्चों को पढ़ाने के लिए बहुत मेहनत करते हैं। हम सरकारी स्कूल के शिक्षकों को बड़ी आसानी से सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। लेकिन उसकी जिम्मेदारी कहीं अधिक होती है।
बदरीनाथ के पास घिघरांण गांव की कला की सहायक अध्यापिका प्रियंका बिष्ट तीन साल पहले इस प्रोफेशन में आई हैं। वो बेहद खुशी के साथ बताती हैं कि हमारे स्कूल को रिजस्ट हर साल अच्छा जाता है। विज्ञान में तो सौ प्रतिशत रिजल्ट आता है। प्रियंका ने बताया कि सरकारी स्कूलों में बच्चों की दिलचस्पी को जगाने के उद्देश्य से जिलाधिकारी की पहल पर स्कूल की दीवारों पर वॉल पेंटिंग बनाई गई। हर विषय से जुड़ी तस्वीरें। बच्चों को पर्यावरण का संदेश देने की तस्वीरें। प्लास्टिक इस्तेमाल न करने की तस्वीरें। बालिका शिक्षा को लेकर बनाई गई पेंटिंग। इसके अलावा कार्टून कैरेक्टर, तितली का जीवन चक्र जैसी तमाम पेंटिंग्स से कला की शिक्षिकाओं ने स्कूल की दीवारों को रंग दिया। वे इस प्रयोग को बेहद सफल बताती हैं। प्रियंका कहती हैं कि दीवारों पर रंगों से दिये गये संदेश बच्चों के जेहन में बस जाते हैं। जो बातें किताबों से समझाना मुश्किल होता है, वो इस तरह बच्चों को आसानी से समझ आ जाता है। वो बताती हैं कि उनके स्कूल में स्मार्ट क्लासेस लगती हैं। बच्चों को कम्प्यूटर की शिक्षा दी जाती है।
प्रियंका ये भी मानती हैं कि सरकारी स्कूलों में कई बार स्थितियां बहुत अच्छी नहीं होतीं। यहां ज्यादातर ऐसे बच्चे पढ़ने आते हैं, जिनके घरों में पढ़ाई का माहौल नहीं होता। घर पर बच्चों को कुछ पढ़ाया नहीं जाता। घर पर कोई ये पूछने वाला नहीं होता कि आज स्कूल में क्या पढ़ाया गया। ऐसे में शिक्षकों की जिम्मेदारी बड़ी हो जाती है। शिक्षकों पर ही गांव के बच्चों का भविष्य टिका होता है।
चमोली के शिक्षक नंद किशोर कहते हैं कि हमें बच्चों को खेल-खेल में पढ़ाने का तरीका सीखना होगा। इसके लिए खेल विधि अपनानी होगी। तकनीकि युग में शिक्षक जब बच्चों को नई तकनीक के ज़रिये पढ़ाएंगे तो उसका असर बेहतर होगा। इसलिए स्कूल का माहौल भी बेहतर होना चाहिए। स्कूलों में खेल का मैदान जरूर होना चाहिए।

रुद्रप्रयाग के जखोली ब्लॉक के दूरस्थ राजकीय हाईस्कूल पालाकुराली की कहानी भी इससे जुदा नहीं है, यहां के छात्र-छात्राएं राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। खास बात यह है कि यहां के बच्चों की लोकभाषा और लोकसंस्कृति पर पकड़ का चर्चा बहुत दूर तक हो चला है। बदलाव के यह कहानी लिखी है स्कूल के विज्ञान के शिक्षक अश्विनी गौड़ ने। बसुकेदार तहसील के किमाणा दानकोट निवासी अश्विनी गौड़ वर्ष 2016 में राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पालाकुराली में तैनाती के बाद से शिक्षा और संस्कृति को संवारने में जुटे हैं। वह छात्र-छात्राओं को लोकबोली, भाषा में लेखन और कविता पाठ के लिए प्रेरित करते हैं। इसके लिए उन्होंने विद्यालय में गढ़वाली मोबाइल लाइब्रेरी की स्थापना की है। लाइब्रेरी में लगभग 100 गढ़वाली भाषा साहित्य की किताबें उपलब्ध हैं। इस मोबाइल लाइब्रेरी के तहत गढ़वाली भाषा साहित्य पर कार्यशाला भी आयोजित की जाती है।
यही नहीं यहां के छात्र-छात्राओं की 60 स्वरचित गढ़वाली कविताओं का संग्रह बुरांशकांठा भी प्रकाशित किया गया है। इस समय विद्यालय के 15 छात्र-छात्राएं लोकबोली, भाषा में लेखन कर रहे हैं। शिक्षक गौड़ कहते हैं, पढ़ाई के साथ हीछात्र-छात्राओं को अपनी लोक संस्कृति से जोड़ना भी जरूरी है। वह यही प्रयास कर रहे हैं।गढ़वाली मोबाइल लाइब्रेरी से उम्मीद से बेहतर नतीजे हासिल हुए हैं। यही नहीं उनके छात्र विद्यालय को नई पहचान दे रहे हैं। इस साल भीयहां के छात्रों का राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान संगोष्ठी में चयन हुआ है।


Leave a comment