Tuesday , 15 September 2026
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जिला पंचायतों में बोर्ड गठन को लेकर सक्रियता तेज, निर्दलीयों को साधने में जुटे दोनों प्रमुख दल

जिला पंचायतों में बोर्ड गठन अब महज संख्या का खेल नहीं, बल्कि रणनीति, विश्वास और समन्वय का विषय बन गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस चुनौतीपूर्ण मुकाबले में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। अगले कुछ दिन राजनीतिक तौर पर काफी दिलचस्प और निर्णायक रहने वाले हैं।

उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के परिणामों के बाद अब जिला पंचायतों में बोर्ड गठन की कवायद तेज हो गई है। देहरादून, अल्मोड़ा और अन्य जिलों में बेहतर प्रदर्शन से उत्साहित कांग्रेस ने निर्दलीय सदस्यों को अपने पक्ष में लाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। वहीं, सत्तारूढ़ भाजपा भी स्थिति को भांपते हुए पूरी ताकत के साथ निर्दलीयों को साधने में जुट गई है।

देहरादून और अल्मोड़ा में कांग्रेस को बढ़त

देहरादून में कांग्रेस को जिला पंचायत की 12 सीटों पर जीत हासिल हुई है, जबकि भाजपा को सिर्फ 7 सीटों से संतोष करना पड़ा। अल्मोड़ा में भी कांग्रेस ने भाजपा को पछाड़ते हुए 14 सीटें जीतीं, वहीं भाजपा को 12 सीटों पर विजय मिली। ऊधम सिंह नगर में दोनों दलों को 12-12 सीटें मिली हैं, जिससे यहां का समीकरण रोचक बना हुआ है।

जमीनी स्तर पर कांग्रेस के प्रयास तेज

जिन नेताओं ने पंचायत चुनाव में कांग्रेस को मजबूत किया, अब पार्टी उन पर ही जिला पंचायतों में बोर्ड गठन की जिम्मेदारी सौंप रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता निर्दलीय सदस्यों को पार्टी की विचारधारा से जोड़ने और समर्थन हासिल करने में जुटे हैं। पार्टी को यह भी आशंका है कि सत्ता में होने के कारण भाजपा का झुकाव निर्दलीयों की ओर हो सकता है।

निर्दलीयों को साधने के प्रयास तेज

हालांकि कांग्रेस के लिए राह आसान नहीं है। राज्यभर में भाजपा को कुल 114 सीट, कांग्रेस को 80 सीट, जबकि 164 सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत हुई है। ऐसे में अधिकांश जिला पंचायतों में बोर्ड गठन की चाबी निर्दलीयों के पास है।

भाजपा भी अपने स्तर पर रणनीतिक बैठकों और संवाद के माध्यम से निर्दलीयों को अपने पक्ष में करने में जुटी हुई है। कई जिलों में जहां कांग्रेस को बढ़त है, वहां भी भाजपा की सक्रियता कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकती है।

गुटबाज़ी से भी कांग्रेस को सतर्क रहना होगा

पार्टी के भीतर गुटीय खींचतान भी इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। कांग्रेस अगर एकजुट होकर निर्दलीयों को साधने में सफल होती है तो कई जिलों में बोर्ड उसके पक्ष में जा सकता है। पिछली बार कांग्रेस ने दो जिलों में अपना बोर्ड बनाया था, इस बार पार्टी अधिक जिलों में कब्जा जमाने की कोशिश में है।

जिला पंचायतों में बोर्ड गठन अब महज संख्या का खेल नहीं, बल्कि रणनीति, विश्वास और समन्वय का विषय बन गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस चुनौतीपूर्ण मुकाबले में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। अगले कुछ दिन राजनीतिक तौर पर काफी दिलचस्प और निर्णायक रहने वाले हैं।

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