पर्वतीय कला केंद्र द्वारा कुमांऊनी बोली-भाषा में मंचित गीत नाट्य ‘वन गमन- सीता हरण’ का प्रभावशाली मंचन

पर्वतीय कला केंद्र द्वारा कुमांऊनी बोली-भाषा में मंचित गीत नाट्य ‘वन गमन- सीता हरण’ का प्रभावशाली मंचन

पर्वतीय कला केंद्र द्वारा पहली बार कुमांऊनी बोली-भाषा में अनुवादित उत्तराखंड की पारंपरिक कालजई रामलीला के अंश ‘वन गमन-सीता हरण’ के मंचन में पात्रों द्वारा गाए गए राग आधारित गायन व अभिनय को दर्शकों द्वारा अपार तालियों की गड़गड़ाहट कर अति उत्साह पूर्वक सराहा गया, पात्रों का उत्साह वर्धन किया गया।

रामलीला उत्तराखंड के जनमानस की आस्था का सबसे बड़ा सम्बल रहा है। जिसको मंचित करना, देखना, सुनना और जीवन में उतारना उत्तराखंडी लोगों की मानसिकता का आदर्श रहा है। इसी आदर्श स्वरूप दिल्ली में प्रवासरत उत्तराखंड के प्रबुद्ध प्रवासियों द्वारा बड़े ही मनोयोग से वर्ष 1968 में गठित ‘पर्वतीय कला केंद्र’ द्वारा गढ़वाली, कुमांऊनी एवं जौनसारी अकादमी दिल्ली सरकार के सानिध्य में मंडी हाउस स्थित एलटीजी सभागार में 3 नवंबर को उत्तराखंड की पारंपरिक संगीतमय तथा विभिन्न राग आधारित सशक्त कालजई रामलीला के अंश ‘वन गमन-सीता हरण’ का प्रभावशाली व यादगार मंचन कुमांऊनी बोली-भाषा गीत नाट्य के रूप में किया गया। उक्त मंचित गीत नाट्य का कुमांऊनी बोली-भाषा में अनुवाद सी एम पपनै द्वारा, निर्देशन बबीता पांडे व संगीत निर्देशन सुधीर रिखाड़ी द्वारा बखूबी किया गया।

कुमांऊनी बोली-भाषा में मंचित गीत नाट्य का श्रीगणेश गढ़वाली, कुमांऊनी एवं जौनसारी अकादमी सचिव संजय गर्ग तथा पर्वतीय कला केंद्र अध्यक्ष सी एम पपनै, महासचिव चंदन डांगी, संस्था संरक्षक पी सी नैनवाल तथा मैजिक अकादमी ऑफ इंडिया अध्यक्ष डॉ के सी पांडे, खुशहाल सिंह रावत, साहित्यकार डॉ. हेमा उनियाल, अमर संदेश समाचार पत्र व पॉलिटिकल ट्रस्ट पत्रिका प्रमुख अमर चंद व निम्मी ठाकुर इत्यादि इत्यादि द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया।

पर्वतीय कला केंद्र द्वारा पहली बार कुमांऊनी बोली-भाषा में अनुवादित उत्तराखंड की पारंपरिक कालजई रामलीला के अंश ‘वन गमन-सीता हरण’ के मंचन में पात्रों द्वारा गाए गए राग आधारित गायन व अभिनय को दर्शकों द्वारा अपार तालियों की गड़गड़ाहट कर अति उत्साह पूर्वक सराहा गया, पात्रों का उत्साह वर्धन किया गया।

कुमांंऊनी बोली-भाषा में मंचित रामलीला में मानस की चौपाइयों, दोहों के गायन व संगीत की प्रधानता रही। राम की भूमिका वीरेंद्र सिंह गुसाई, लक्ष्मण आनंद जोशी, सीता नीमा गुसाई, शूर्पणखा चन्द्रा बिष्ट, सुमंत पद्ममेद्र रावत, रावण महेंद्र सिंह लटवाल, खेवट के एस बिष्ट, खर व दूषण क्रमशः योगेश पांडे व खिलानंद भट्ट तथा स्वर्ण मृग की भूमिका नवीन चंद्र भगत द्वारा निभाई गई। उक्त पात्रों के लय बद्ध गायन व अभिनय ने श्रोताओं को भाव विभोर किया, श्रोताओं के मध्य यादगार छाप छोड़ी। पात्रों की वस्त्र सज्जा, आभूषण व श्रृंगार रामकथा के अनुकूल व प्रभावशाली थी।

कुमांऊनी बोली-भाषा में मंचित गीत नाट्य में प्रतिभाग करने वाले अन्य कलाकारों भगत सिंह नेगी, भुवन रावत, नवीन त्रिपाठी, हरीश रावत, दीपक राणा, लक्ष्मी रौतेला महतो, सुरेशी दानू, मानसी भट्ट, मिनी ढाका, पूनम तोमर, तूलिका बिष्ट व यामिनी द्वारा भी कुमांऊनी बोली-भाषा में प्रभावशाली गीत गायन व अभिनय कर दर्शकों को प्रभावित किया। हारमोनियम पर सुधीर रिखाड़ी, तबला पर सुंदर लाल आर्या, बांसुरी दीपक सेमवाल, पखावज अर्शदीप तथा ताल वाद्य में मधु बेरिया साह व शैलेन्द्र सिंह चौहान द्वारा की गई प्रभावशाली संगत तथा मंच पीछे पार्श्व गायक-गायिकाओं की गायन विधा ने श्रोताओं के मध्य दोहों तथा राग आधारित गायन ने यादगार छाप छोड़ी।

मीता मिश्रा द्वारा की गई प्रकाश परिकल्पना, सुधीर रिखाड़ी के संगीत निर्देशन, बबीता पांडे के निर्देशन तथा सी एम पपनै द्वारा कुमांऊनी बोली-भाषा अनुवादित गीत नाट्य ‘वन गमन-सीता हरण’ के मंचन ने रंगमंच जगत से जुड़े लोगों का ध्यान आकर्षित किया है, प्रभावित किया है।

उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल की गायन शैली पर आधारित तथा वैश्विक फलक पर विख्यात रामलीला को कुमांऊनी बोली-भाषा में मंचित कर रंगमंच जगत को एक नया आयाम पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली द्वारा देने का प्रयास किया गया है जो अति प्रशंसनीय व प्रभावशाली है।

दस दिनी उत्तराखंडी भीमताली शैली की रामलीला की सशक्त गायन शैली व रागों की महत्ता को देखते हुए, जो प्रत्येक उत्तराखंडी में आत्मसात है, कुमांऊनी बोली-भाषा में मंचित किए गए इस गीत नाट्य ने रंगमंच जगत को एक अलग आयाम देने का प्रभावशाली प्रयास किया गया है। एक ही दिन में उक्त गीत नाट्य के दो शो मंचित कर निश्चय ही पर्वतीय कला केंद्र ने अपनी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ख्याति की पुनः पुष्टि की है।

कुमांऊनी बोली-भाषा में मंचित किए गए इस गीत नाट्य के अनेकों शो पर्वतीय कला केंद्र को मंचित करने की योजना बनानी चाहिए, केंद्र और राज्य सरकार को यथा संभव इस संस्था द्वारा मंचित गीत नाट्य के अनेकों शो उत्तराखंड के साथ-साथ देश के विभिन्न उत्तराखंडी जन बहुल इलाकों में मंचित करवा कर उत्तराखंड की बोली-भाषा के संवर्धन हेतु बढ़ चढ़ कर कदम बढ़ाना चाहिए, मदद करनी चाहिए, उत्तराखंड की बोली भाषा के हितार्थ।

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