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बागेश्वर के दो भाइयों की कोरोना में गई नौकरी, घर लौटकर बनाने लगे देसी दालों की नमकीन

शहरों से जिन लोगों की नौकरियां कोरोना के समय में गईं, उनमें सबके रोजगार या कामकाज शुरू नहीं हो पाया है। बहुत लोग ऐसे भी हैं जिन्हें वापस काम नहीं मिला है। वे राह देख रहे हैं कि कब उन्हें कोई काम मिले, पर कुछ लोगों ने अब तक के अपने अनुभव और हुनर से कुछ नया रास्ता निकाल लिया है।

बागेश्वर जिले के गिरिश और पूरन मलड़ा का शहर में रोजगार चला गया, पर इन्होंने हार नहीं मानी। कोरोना काल में ऐसे लोगों की संख्या हजारों, लाखों में हैं जिनके सामने रोजगार का संकट है। आज मलड़ा बंधु उनके लिए उदाहरण बन गए हैं। दरअसल, लॉकडाउन के बाद ये दोनों भाई बेरोजगारी हो गए थे। ऐसे में शहरों से इन्हें अपने गांव लौटने को मजबूर होना पड़ा। आगे क्या हुआ पढ़िए #uttarakhandpositive की आज की इस कड़ी में

गिरीश मलड़ा लॉकडाउन से पहले कठायतवाड़ा में एक ब्रेकरी में नमकीन बनाने का काम करते थे। कोरोना काल में काम छूट जाने पर घर पर बेरोजगार हो गए तो उन्होंने सोचा क्यों न कोई काम किया जाय। इस बीच दिल्ली से लॉकडाउन के चलते भाई पूरन भी लौट आए। दोनों ने मिलकर खुद का रोजगार शुरू करने की सोची और शुरू कर लिया अपना खट्टे-मीठे जायके के साथ नमकीन का कारोबार।

बागेश्वर में नमकीन का स्वरोजगार… मुश्किलें तो आईं पर जब इरादे मजबूत हों तो कोई डिगा नहीं सकता। पूरन मलड़ा दिल्ली के एक होटल में काम करते थे, लेकिन ये रोजगार कोरोना की भेंट चढ़ गए थे। दोनों भाई काफी समय घर पर बैठे रहे और उन्हें लगा कि आय के लिए क्यों न घर पर ही कुछ किया जाए।

दोनों भाई रोजगार के विकल्प तलाशने लगे। कुछ समय बाद जब सरकार द्वारा लॉकडाउन में रियायतें मिली तो इन्होंने सोचा कि अब अपने गांव में ही रहकर स्थानीय दालों की नमकीन बनाकर बेचेंगे। गिरीश ने गांव में मौजूद दालों को इकट्ठा किया और छोटे भाई पूरन ने इस रोजगार को शुरू करने के लिए ऋण सम्बन्धी कार्रवाई पूरी की।

फिर दोनों भाइयों ने पूर्ण रूप से घरों में पाई जाने वाली दालों का प्रयोग नमकीन बनाने के लिए शुरू कर दिया। गांव में खुद के बलबूते पर स्वरोजगार शुरू करने के लिए इन दोनों भाइयों को स्थानीय प्रशासन ने खूब सराहा है। पिछले दिनों इस स्वरोजगार के शुभारंभ के दिन जनप्रतिनिधियों के साथ ही नगर पालिका अध्यक्ष सुरेश खेतवाल ने भी इनकी बनाई हुई नमकीन का स्वाद लिया।

हिल-मेल से हुई बातचीत में गिरिश ने बताया कि गांव में रोजगार शुरू करने से उन्हें अब अपने घर के नज़दीक काम करने का मौका मिला है जिसके जरिए वे अपने हुनर से गांव में ही काम कर सकते हैं। छोटे भाई पूरन ने बताया कि गांव की दालों का प्रयोग करके अब वे इस स्वरोजगार को आगे बढ़ाएंगे और इसके जरिये स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देंगे।

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Hill Mail

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