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हर वार्ड में जैविक शौचालय, बागेश्वर नगरपालिका की पहल

जैविक शौचालयों में ऐसे बैक्टीरिया होते हैं जो मल आदि के सड़ने में मदद करते हैं। आखिर में नाइट्रोजन गैस और पानी ही बचता है। इसके बाद पानी को रिसाइकल कर फिर से शौचालयों में इस्तेमाल किया जाता है।

सरयू और गोमती नदी के संगम पर बसे बागेश्वर शहर का अपना धार्मिक महत्व है। साल भर पवित्र संगम तट पर स्नान के लिए श्रद्धालु आते रहते हैं। उधर, नगर में सीवेज लाइन नहीं होने से सभी शौचालयों की गंदगी नदी में ही मिलती रहती है। इसके कारण नदियां प्रदूषित होती रही हैं। अब नदियों को स्वच्छ बनाए रखने के लिए बागेश्वर नगरपालिका ने नई पहल की है।

पालिका की ओर से हर वार्ड में जैविक शौचालय बनाने का फैसला किया गया है। इस मुहिम का जनता ने भी स्वागत किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि बागेश्वर ढलान में बसा है। ऐसे में पूरा मलबा नदी में चला जाता है। बायो-टॉइलेट होने से मल-मूत्र नदी में सीधे नहीं जाएगा बल्कि अब उसका सही से निस्तारण हो सकेगा।

आपको बता दें कि जैविक शौचालयों में ऐसे बैक्टीरिया होते हैं जो मल आदि के सड़ने में मदद करते हैं। आखिर में नाइट्रोजन गैस और पानी ही बचता है। इसके बाद पानी को रिसाइकल कर फिर से शौचालयों में इस्तेमाल किया जाता है या खेती के काम में इस्तेमाल किया जा सकता है।

80 हजार आएगा खर्च

बागेश्वर में पर्यावरण प्रदूषण रोकने के उद्देश्य शुरू की गई इस पहल का लोगों ने स्वागत किया है। नगरपालिका के अधिकारियों का कहना है कि अब जो भी टॉयलेट बनेंगे, सभी बायो-टॉयलेट बनेंगे। कुछ जैविक शौचालय बनकर तैयार भी हो गए हैं। आगे चलकर सभी सार्वजनिक शौचालयों को जैविक शौचालयों में बदलने पर काम होगा। बताया जा रहा है कि एक जैविक शौचालय के निर्माण में करीब 80 हजार रुपये का खर्च आता है।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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