बकीबातः हरीश रावत बने ‘राजनैतिक नर्तक’, सियासी मायने खोज रहे कांग्रेसी

बकीबातः हरीश रावत बने ‘राजनैतिक नर्तक’, सियासी मायने खोज रहे कांग्रेसी

उत्तराखंड में क्या है सियासी गलियारों की कानाफूसी, क्या हो रहा है सरकारी महकमों में..। टी. हरीश के खास कॉलम ‘बकीबात’ में जानिये…ताजा अपडेट।

  • टी हरीश

हरदा क्यों बने ‘राजनैतिक नर्तक’, सियासी मायने खोज रहे कांग्रेसी

अपने बयानों से राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत हरदा ने खुद को राजनैतिक नर्तक बता कर राज्य में नया विवाद छेड़ा दिया। हर कोई हरदा के बयान के मतलब निकालने लगे, क्योंकि राज्य की सियासत से हरदा दूर हैं। लेकिन उनका मन हमेशा राज्य में लगा रहता है। लेकिन राज्य में उनके सहयोगी उनके लिए विपक्षी दलों की तरह व्यवहार करते हैं और हर किसी को यही लगता है कि हरदा की कभी भी राज्य में वापस आ सकते हैं। हरदा ने इशारों में ये भी कह दिया कि घुंगरू के कुछ दाने टूटने से नर्तक के पैर थिरकना नहीं छोड़ देते। मतलब साफ है कि अगर राज्य से बाहर भी हैं तो राज्य की राजनीति में दखल देना नहीं छोड़ सकते हैं। हरदा ने ये भी कहा कि सामाजिक और राजनीतिक धुन कहीं भी बजेगी तो वह जरूर थिरकेंगे। फिलहाल राज्य में पंजे वाली पार्टी के नेता हरदा के बयानों के अपनी तरह से सियासी मतलब निकाल रहे हैं और इन आवाजों का मजा ले रहे हैं।

मूल निवासी के जरिये हाशिए से बाहर आएंगे नेताजी

उत्तराखंड में नवंबर में राज्यसभा की एक सीट खाली हो रही है। इसके लिए लॉबिंग का दौर शुरू हो गया है। राज्य की सत्ताधारी पार्टी में इस एक पद के लिए करीब दो दर्जन से ज्यादा नेता अपने नाम को विभिन्न चैनलों के जरिये बढ़ा रहे हैं। हालांकि अंतिम फैसला दीनदयाल उपाध्याय मार्ग का होगा। क्योंकि इसके लिए नेताओं ने अपने मीडिया के संपर्कों के जरिये अपने नामों को चलाना शुरू कर दिया है। वहीं ये भी कहा जा रहा है कि सांसद बाहर का भी हो सकता है। लिहाजा इसके लिए स्थानीय नेताओं ने इसकी काट निकाल दी है। उन्होंने इसके लिए मूल निवासी का नियम बनाने की बात कही है। लिहाजा बाहरी नेताओं का पत्ता कट गया है। अब तो उम्मीद केवल दिल्ली की है। क्योंकि अगर वह चाहेगा तो किसी को भी सांसद बना सकता है। फिलहाल राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री अपने नाम को मीडिया के जरिये प्रसारित करा रहे हैं और अब उन्हें उम्मीद है कि पार्टी उन्हें हाशिए से उठाकर राज्यसभा में पहुंचाएगी।

सांसद ने चला दांव और विपक्षी नेता जपने लगे नाम

उत्तराखंड में देवस्थानम बोर्ड के मुद्दे पर भाजपा की सरकार अपने ही सांसद के निशाने पर आ गई है। आखिर ऐसा क्यों? असल में कहा जा रहा है कि कभी प्रदेश अध्यक्ष के पद पर रहे नेता अब सांसद हैं। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष से हटने के बाद कोई हैसियत नहीं रह गई है। लिहाजा कहीं पूछ भी नहीं है। लिहाजा कैसे अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जाए। लिहाजा उन्होंने देवस्थानम बोर्ड के जरिए ही निशाना साध दिया और बैठे बिठाए विपक्ष को मुद्दा दे दिया। सांसद भी चाहते थे कि उनके एक बयान से राज्य की सियासत में हलचल तेज और लोग उनका नाम लें और वह मीडिया की सुर्खियों में छा जाए। हुआ भी वही और कांग्रेस उनके जाल में फंस गई और अब कांग्रेस सरकार से ज्यादा उनका नाम ले रही है और वह मीडिया की सुर्खियों में बने हुए हैं।

प्रमोटी आईएएस सौतेला भाई बराबर

पिछले दिनों राज्य में आईएएस अफसरों के तबादले हुए और इसके जरिये राज्य में सीधी भर्ती वाले आईएएस और प्रमोटी आईएएस के बीच होने वाला विवाद एक बार फिर उभर कर सामने आ गया। जबकि दोनों ही आईएएस हैं। लेकिन आरआर वाले आईएएस अफसर प्रमोटी आईएएस अफसरों को सौतेले भाई से कम नहीं समझते हैं और सौतेला व्यवहार करते हैं। राज्य में पिछले दिनों आईएएस अफसरों के प्रभारी सचिव के पद के समकक्ष प्रमोशन होने के बाद भी इन अफसरों को शासन में अपर सचिव के पद पर नियुक्त किया गया। इसमें एक अफसर तो मुख्यमंत्री के विश्वासपात्र और खास अफसरों में शुमार हैं। जिन अफसरों को प्रभारी सचिव बनना था, उन्हें आईएएस लॉबी ने अपर सचिव बनने के लिए मजबूर कर दिया। इन अफसरों को प्रभारी सचिव के पद पर नियुक्ति नहीं दी, क्योंकि इन पदों पर आरआर वाले आईएएस अफसर अपना हक समझते हैं। फिलहाल राज्य में एक बार फिर डायरेक्ट और प्रोमोटी आईएएस के विवाद उभर कर सामने आ गया है। फिलहाल कहा जा रहा है कि ये खेल राज्य में जानबूझकर किया गया है, क्योंकि सौतेला भाई सौतेला ही होता है।

सीएस को लेकर सरकार ने नहीं खोले पत्ते

इस महीने के आखिर में उत्तराखंड के मौजूदा चीफ सेक्रेटरी उत्पल कुमार सिंह रिटायर हो रहे हैं। लेकिन राज्य सरकार ने इसको लेकर अभी तक पत्ते नहीं खोले हैं और जाहिर है कि इससे फ्रंट रनर तनाव में होंगे, क्योंकि राज्य में भाजपा की सरकार है कब किसका नंबर लग जाए। ये सब भाजपा सरकारों में कई बार हो चुका है। वहीं राज्य सरकार इस मामले में कुछ भी कहने से बच रही है। ये भी हो सकता है कि उत्पल कुमार सिंह को राज्य सरकार तीन महीने का सेवा विस्तार दे। हालांकि इसकी फाइल अभी तक राज्य सरकार ने केंद्र को नहीं भेजी है। ये भी हो सकता है कि दिल्ली में नाम तय हो गया है और इसकी जानकारी राज्य सरकार के पास भी न हो। लेकिन कयासों का दौर जारी है।

 

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं, ये उनके अपने विचार हैं)

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