सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के लगभग एक-तिहाई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) गंगा में बिना शोधित सीवेज जाने से रोकने में असफल रहे हैं। कई एसटीपी अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक भार झेल रहे हैं, जबकि कुछ संयंत्र बेहद कम क्षमता पर संचालित हो रहे हैं। इससे न केवल परियोजना की योजना निर्माण प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं, बल्कि संसाधनों के असंतुलित उपयोग की भी तस्वीर सामने आई है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि हरिद्वार का 68 एमएलडी क्षमता वाला एसटीपी अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक सीवेज का उपचार कर रहा है। वहीं ऋषिकेश का पांच एमएलडी एसटीपी भी अपनी क्षमता से कई गुना अधिक दबाव झेल रहा है। इसके विपरीत देवप्रयाग का एसटीपी अपनी कुल क्षमता के केवल तीन से चार प्रतिशत पर ही संचालित हो रहा है। सीएजी ने इसे योजना निर्माण में गंभीर खामी बताते हुए कहा है कि कहीं संयंत्रों पर अत्यधिक दबाव है तो कहीं करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी वे लगभग खाली पड़े हैं।
ऑडिट रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि वर्ष 2018 से 2023 के दौरान नमामि गंगे के तहत संचालित परियोजनाओं के संचालन और रखरखाव में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। परिणामस्वरूप राज्य सरकार गंगा में बिना शोधित सीवेज के प्रवाह को रोकने के अपने प्रमुख उद्देश्य को हासिल नहीं कर सकी।
रिपोर्ट के अनुसार, सात कस्बों में बनाए गए 21 एसटीपी महज सांकेतिक परियोजनाएं बनकर रह गए हैं, क्योंकि वे पर्याप्त सीवरेज नेटवर्क से ही नहीं जुड़े। कई स्थानों पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद घरों को सीवर कनेक्शन नहीं दिए गए। ऐसे में बड़ी मात्रा में घरेलू गंदा पानी आज भी नालों के माध्यम से सीधे गंगा और उसकी सहायक नदियों में पहुंच रहा है।
सीएजी ने विशेष रूप से जोशीमठ का उदाहरण देते हुए बताया कि वहां करोड़ों रुपये खर्च कर सीवरेज व्यवस्था तैयार की गई, लेकिन किसी भी घर को उससे नहीं जोड़ा गया। इससे पूरी परियोजना का उद्देश्य ही अधूरा रह गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल एसटीपी बनाना पर्याप्त नहीं है, जब तक घरों को सीवर नेटवर्क से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक गंगा को प्रदूषण मुक्त नहीं बनाया जा सकता।
ऑडिट में संचालन और रखरखाव की कमियों का भी उल्लेख किया गया है। कई एसटीपी का नियमित रखरखाव नहीं हो रहा है, जबकि कुछ स्थानों पर उपचार प्रक्रिया से निकलने वाला जहरीला स्लज सुरक्षित निस्तारण के बजाय किसानों के खेतों तक पहुंच गया, जिससे पर्यावरण और कृषि दोनों पर खतरा उत्पन्न होने की आशंका जताई गई है।
सीएजी ने योजना निर्माण में भी गंभीर कमियां चिन्हित की हैं। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य स्तर पर रिवर बेसिन मैनेजमेंट प्लान वर्षों बाद भी तैयार नहीं किया गया। जिला स्तर पर भी कोई समग्र योजना मौजूद नहीं मिली। इसके अलावा स्थानीय समुदायों और जनप्रतिनिधियों की पर्याप्त भागीदारी सुनिश्चित नहीं की गई, जिसके कारण कई परियोजनाएं स्थानीय आवश्यकताओं और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप विकसित नहीं हो सकीं।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि राज्य सरकार ने अपने संसाधनों से गंगा तटीय नगरों में स्वच्छता ढांचे के विकास के लिए कोई उल्लेखनीय निवेश नहीं किया। अधिकांश परियोजनाएं केंद्र सरकार की सहायता पर निर्भर रहीं।
सीएजी की यह रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि केवल बजट आवंटन और परियोजनाओं की घोषणा से गंगा को निर्मल नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए प्रभावी योजना, समयबद्ध क्रियान्वयन, सीवर नेटवर्क का विस्तार, नियमित रखरखाव और स्थानीय समुदाय की भागीदारी अनिवार्य है। अन्यथा नमामि गंगे जैसी महत्वाकांक्षी योजना पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा।




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