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उत्तराखंड से पलायन का अध्ययन 1970 के दशक से हो रहा है, लेकिन यह मुद्दा 1990 के दशक में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के समय व्यापक रूप से सार्वजनिक चर्चा में आया और राज्य के गठन 2000 के बाद भी यह प्रासंगिक बना हुआ है।
READ MOREउत्तराखंड पेयजल निगम में 2660 करोड़ की अनियमितताओं का खुलासा सिर्फ एक घोटाला नहीं, बल्कि व्यवस्था की खोखली पड़ चुकी रीढ़ का आईना है। RTI एक्टिविस्ट व अधिवक्ता विकेश सिंह नेगी ने सीएजी रिपोर्टों और वर्षों तक न हुए ऑडिट के आधार पर जो तथ्य सामने रखे, वे बताते हैं कि यह महज “लापरवाही” नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार है।
READ MOREइस अक्टूबर, नंदाकिनी घाटी में हुई तबाही को भूविज्ञान विशेषज्ञ प्रो. महेंद्र प्रताप सिंह बिष्ट ने बेहद नज़दीक से देखा। दशकों से पहाड़ों को पढ़ने-समझने वाले बिष्ट बताते हैं कि यह आपदा प्रकृति के क्रोध से नहीं, बल्कि हमारी अनियंत्रित बसावट, लालच और वैज्ञानिक चेतावनियों की अनदेखी का नतीजा है। घाटी बार-बार संकेत देती है, क्या हम सुनेंगे?
READ MOREउत्तराखंड सरकार राज्य में साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने में लगी हुई है। इसी के तहत राज्य में प्रोफेशनल एवं प्रमाणित रिवर गाइड तैयार करना, युवाओं को स्थायी एवं सम्मानजनक आजीविका उपलब्ध कराना और स्थानीय स्तर पर स्व-रोज़गार और छोटे उद्यमों को बढ़ावा देना है।
READ MOREदेहरादून में वरिष्ठ पत्रकार जयसिंह रावत की पुस्तक का विमोचन किया गया। जयसिंह रावत ने हर युग की राजनीति को बिना पर्दा उठाए नहीं छोड़ा, चाहे वह भगत सिंह कोश्यारी का महत्वपूर्ण पर विवादित दौर हो, भाजपा के भीतर नेतृत्व चयन की खींचतान हो, निशंक का समय हो, विजय बहुगुणा की वह सरकार जो आपदा के घावों में डगमगाई, या हरीश रावत का वह अध्याय जहां मुख्यमंत्री कुर्सी शक्ति के मुकाबले किस्मत से ज्यादा हिली।
READ MOREउत्तराखंड में भालू और गुलदार के बढ़ते हमलों पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कड़ा रुख अपनाया है। संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ाने, उपकरणों की खरीद और त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार ने 50 लाख रुपये जारी किए हैं ताकि वन विभाग तत्काल प्रभाव से सुरक्षा और बचाव उपाय मजबूत कर सके।
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प्रिया सिंह चौहान ने हासिल की 45वीं रैंक, मीनल नेगी 66वीं और अनुज पंत 69वीं रैंक के साथ प्रदेश का बढ़ाया मान
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उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों से उठी न्याय की एक आवाज अब देश की राजधानी तक पहुंचने की राह पर है। एक ओर जहां देश के जवान सीमाओं पर तैनात होकर राष्ट्र की सुरक्षा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके परिवार के लोग अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं।
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