Monday , 14 September 2026
Home उत्तराखंड न्यूज़ जंगल में बचपन गुम: वन गुर्जर बस्तियों में शिक्षा से दूर होते बच्चे, बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव
उत्तराखंड न्यूज़देहरादून

जंगल में बचपन गुम: वन गुर्जर बस्तियों में शिक्षा से दूर होते बच्चे, बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव

विकासनगर क्षेत्र के कुंजा गांव और आसपास की वन गुर्जर बस्तियों से एक ऐसी हकीकत सामने आई है, जो शिक्षा और विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है। यहां के बच्चे स्कूल की किताबों से ज्यादा घर और जंगल के कामों में उलझे हुए हैं। नतीजा यह है कि उनका बचपन और भविष्य दोनों अधर में लटक गए हैं।

कुंजा गांव की बस्ती में रहने वाली सात साल की खलीमा इसका जीवंत उदाहरण है। वह स्कूल तो जाती है, लेकिन नियमित पढ़ाई और माहौल के अभाव में सीख नहीं पा रही। बस्ती में करीब 40 परिवार रहते हैं और लगभग 30 बच्चे हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 15-20 ही स्कूल जाते हैं। बाकी बच्चे दिनभर पशु चराने, लकड़ी लाने और घरेलू कामों में लगे रहते हैं।

यहां बुनियादी सुविधाओं की हालत भी बेहद खराब है। पानी के लिए टंकी तो है, लेकिन ट्यूबवेल खराब पड़ा है। बिजली लाइन मौजूद है, पर आपूर्ति अनियमित है। सबसे गंभीर समस्या शौचालय की है—लोगों को खुले में शौच के लिए जाना पड़ता है, जिससे खासकर महिलाओं और बच्चों को दिक्कत होती है। बरसात और रात के समय यह समस्या और बढ़ जाती है।

बस्ती के युवक हनीफ बताते हैं कि उन्होंने पांचवीं तक पढ़ाई की, लेकिन पिता के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी उठाने के लिए पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अब वे मजदूरी कर जीवन यापन कर रहे हैं। वहीं, आतिक इलाही नामक युवक ने विकलांग पेंशन न मिलने की शिकायत की, जबकि उन्होंने कई बार आवेदन किया है।

बुजुर्गों की इच्छा है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर बेहतर जीवन जिएं, लेकिन मजबूरियां उन्हें पीछे खींच लेती हैं। जंगल में रहने के कारण रोजी-रोटी के लिए पशुपालन और लकड़ी पर निर्भर रहना पड़ता है। ऊपर से जंगल जाने के परमिट और रास्तों में रोक-टोक जैसी समस्याएं भी जीवन को और कठिन बना देती हैं। बस्ती के लोग जंगली जानवरों, खासकर हाथियों के डर में भी जीते हैं।

पास ही स्थित आदुवाला क्षेत्र की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। यहां पानी के लिए लोगों को हाईवे किनारे ढाबों पर निर्भर रहना पड़ता है। स्कूल करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है, लेकिन बच्चों को पढ़ाने की जागरूकता कम है। बड़े बच्चे अधिकतर समय मवेशियों की देखभाल में बिताते हैं।

जैतून जैसी युवतियां, जिन्होंने पांचवीं तक पढ़ाई की है, भी आज घर और पशुपालन तक सीमित हैं। वह कुछ करना चाहती हैं, लेकिन रोजगार और प्रशिक्षण के अवसर नहीं हैं। पहले एक संस्था ने सिलाई सिखाने का वादा किया, लेकिन वह भी अधूरा रह गया।

हालांकि, शिक्षा विभाग का कहना है कि सभी बच्चों को स्कूल से जोड़ने के लिए अभियान चलाया जा रहा है और इन बस्तियों में भी शिक्षक भेजे जाएंगे। लेकिन जब तक बुनियादी सुविधाएं, जागरूकता और स्थायी समर्थन नहीं मिलेगा, तब तक इन बच्चों का भविष्य यूं ही संघर्ष में उलझा रहेगा।

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

Related Articles

छह वर्षों में 30,286 लाभार्थियों तक पहुंचा उद्यान विभाग की योजनाओं का लाभ

पर्वतीय क्षेत्रों में बागवानी को किसानों की आजीविका का बेहतर माध्यम बनाने...

ओपीयू-आईवीएफ तकनीक से साहीवाल गाय ने दिया बद्री बछिया को जन्म

गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर और राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान...