डॉ. प्रकाश उप्रेती
भारत और चीन के बीच 3448 किलोमीटर की सीमा है जिसमें जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल प्रदेश तक का क्षेत्र आता है। इस सीमा को तीन अलग-अलग सेक्टरों में देखा जाता है। एक पश्चिमी सेक्टर-जम्मू-कश्मीर और लद्दाख फिर मध्य सेक्टर में-उत्तराखंड और हिमाचल और तीसरा पूर्वी सेक्टर के अंतर्गत सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश का क्षेत्र आता है।
भारत के अतिरिक्त चीन 13 अन्य देशों के साथ सीमा साझा करता है। चीन ने अपनी विस्तारवादी नीति के कारण कमोबेश सभी पड़ोसी देशों के साथ सीमा पर तनाव का माहौल पैदा किया है। भारत के साथ चीन का सीमा विवाद नया नहीं है लेकिन हाल के वर्षों में चीन ने भारत की सीमा पर कई बार घुसपैठ करने की कोशिश की है।
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हालांकि हर बार उसे मुँह की खानी पड़ी है उसके बावजूद उत्तराखंड, लद्दाख और अरुणाचल के सीमावर्ती क्षेत्रों में वह लगातार तनाव पैदा कर रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। परंतु उनमें से एक प्रमुख कारण भारत का सीमावर्ती क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ करना है।
इस बात की पुष्टि भारतीय सेना की कुमाऊँ स्कॉट रेजिमेंट से रिटायर सूबेदार उमाकांत द्विवेदी भी करते हैं। वह उत्तराखंड से लगने वाली भारत-चीन सीमा पर लंबे समय तक सेवारत रहे हैं। वह कहते हैं ‘सीमा पर चीन के सैनिक पहले से ही उकसावे की हरकतें करते रहते थे लेकिन जब से भारत ने सीमावर्ती इलाकों में सड़क निर्माण का काम आरंभ किया, तब से चीन की तरफ से ज्यादा उकसाने की कोशिशें हो रही हैं। यह मध्य से लेकर पूर्वी और पश्चिमी तीनों सेक्टरों में हो रही हैं।

इधर तो चीन के सैनिक कभी हमारी सेना और कभी ग्रामीणों के साथ उलझ रहे हैं। कई बार चीन के सैनिक बकरवालों की बकरियों को भी उठाकर ले जाते हैं जबकि ये बकरवाल भारतीय सेना के लिए आँख-कान का काम भी करते हैं’। वैसे इन बर्फीले इलाकों में बकरी और भेड़ चराने वाले लोकल लोग सेना के लिए गाइड का काम भी करते हैं क्योंकि उन्हें रास्तों के बारे में बेहतर जानकारी होती है। इसलिए सेना का सीमावर्ती इलाकों से लगे गाँव और घुमंतू समुदाय के साथ अच्छा तालमेल रहता है।
हिमालय के इस पूरे क्षेत्र में सेना के अलाव सिविलियन की आबादी बहुत कम ही होती है। चीन से लगी सीमा के बहुत से गाँव सन् 1962 की लड़ाई के समय खाली हो गए थे। उन गांव में फिर बसावट नहीं हुई। इधर उत्तराखंड सरकार जरूर उन गांवों को फिर से बसाने की कोशिशें कर रही है।

वैसे भी कुछ-कुछ इलाकों में जो थोड़ा बहुत आबादी है भी तो वह सितंबर-अक्टूबर के बाद ठंड और बर्फबारी के कारण नीचे मैदानी इलाकों में आ जाती है। उसके बाद तो वह मार्च-अप्रैल तक ही वापस लौटते हैं। ऐसे में सेना के लिए भी इन इलाकों में काम करना मुश्किल होता है। उसके बावजूद सेना बड़ी मुस्तैदी के साथ इन क्षेत्रों में अडिग रहती है।
भारत से लगने वाली चीन की सीमा के अधिकतर क्षेत्रों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर यानि आधरभूत ढांचे की परेशानियां रही हैं। उत्तराखंड से लेकर सिक्किम और अरुणाचल के सीमावर्ती क्षेत्रों का बड़ा हिस्सा वर्षों से मुख्य हिस्सों से अलग-थलग ही रहा। परन्तु पिछले कुछ वर्षों से सरकार ने इस तरफ बहुत तेजी काम करना आरंभ किया। दरअसल यही बात चीन को सबसे ज्यादा खटक रही है। इसलिए भी वह लगातार सीमा पर भारत को डिस्टर्ब करने की कोशिश कर रहा है।
चीन के इस रवैये को चुनौती देते हुए भारत सरकार ने पिछले एक दशक में उत्तराखंड के मलारी, रिमखिम, नेलांग घाटी और लिपूलेख जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों तक सड़क निर्माण का कार्य किया है। इस सड़क निर्माण का जहाँ सामरिक महत्व तो वहीं इन सीमावर्ती गांवों को मुख्यालय से जोड़ने में भी ये सड़कें सहायक हैं।

इसी तरह सिक्किम, लद्दाख और अरुणाचल में भी सरकार ने सीमा तक पहुँच को आसान बनने के लिए सड़क, पुल और सुरंगों के साथ हवाई पट्टी का निर्माण भी तेजी से किया है। इस बात की पुष्टि पिछले मानसून सत्र में रक्षा राज्य मंत्री के द्वारा जो कहा गया उससे होती है। उन्होंने कहा कि ‘हमने पिछले 5 वर्षों में चीन की सीमा से लगे इलाकों में करीब 2088 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया है’। यह निर्माण कार्य क्षेत्रीय संपर्क के साथ-साथ रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
इसकी प्रतिक्रिया के रूप में भी हाल की घटनाओं को देखा जा सकता है क्योंकि पिछले दो-तीन वर्षों में चीन की तरफ से पूर्वी, पश्चिमी और मध्य सेक्टरों में जो भी घटनाएं हुई हैं वह सैन्य कार्यवाही से अधिक प्रभुत्व की लड़ाई नज़र आती है। जबकि चीन भी जानता है कि अब यह सन् 1962 वाला भारत नहीं है। इस बात का एहसास चीन की सेना को पिछले वर्षों में हुई झड़पों में भारतीय सेना ने करवा दिया है। उसके बावजूद चीन भारत को अस्थिर करने की नाकाम कोशिश करता रहता है।
इसी 9 दिसंबर को अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले के यांग्त्से इलाके में हुई झड़प को भी इसी कड़ी में समझा जा सकता है। इस बार भी भारत की सेना ने चीनी सैनिकों के मंसूबों को नाकाम करते हुए उन्हें खदेड़ दिया। अब सवाल चीनी की नीति और नीयत पर है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर भी चीन की हरकतों को ताइवान से लेकर भारत के सीमावर्ती इलाकों तक सबने देख ली हैं।


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