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चर्चा की मेज पर विपक्ष, यूं ही कोई त्रिवेंद्र नहीं हो जाता

विपक्षी नेताओं के सुझावों को सीएम त्रिवेंद्र ने पूरी शिद्दत के साथ सुना और लोकतंत्र में विपक्ष की भावनाओं का जिस तरह से आदर किया जाना चाहिए वह किया। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष प्रीतम सिंह के नेतृत्व में हरीश रावत, गणेश गोदियाल, जोत सिंह बिष्ट, सुशील राठी, प्रभुलाल बहुगुणा, पूरन सिंह रावत, जसबीर सिंह रावत आदि लोग सम्मिलित थे।

अपवाद स्परूप एक आध वाकयों को छोड़ दें, तो उत्तराखंड के इतिहास में ऐसा मौका कभी नहीं आया जब सत्ताधारी पार्टी के मुखिया ने विपक्ष के नेताओं के साथ बैठ कर किसी मसले पर पूरी गंभीरता के साथ चर्चा की हो, या कभी उनके सुझावों को किसी तरह की तवज्जो दी हो। लोकतंत्र की इस स्वस्थ्य परंपरा के निर्वहन में सत्ता का नशा और अहम का टकराव हमेशा ही रोड़ा बनता रहा। लेकिन गत दिवस मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जिस तरह विपक्ष के नेताओं को चर्चा की मेज पर तव्वजो दी, उनके साथ पूरी तसल्ली के साथ चर्चा की, वह उनके विरोधियों को भी मुरीद बनाने के लिए काफी तो है ही, सत्ता और कुर्सी के मद में चूर रहने वाले धुरंधरों के लिए एक बहुत बड़ी नसीहत भी है।

पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेसी दिग्गज हरीश रावत, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह, पूर्व विधायक गणेश गोदियाल व अन्य नेताओं ने गत दिवस मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र से मुलाकात की। बात चमोली आपदा पर राहत कार्यों से लेकर मदद और सहयोग व इसी से संबंधित अन्य मसलों पर हुई।

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यहां सीएम त्रिवेंद्र बताया कि ने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में राहत एवं बचाव कार्य तेजी से चल रहे हैं। एनटीपीसी की सुरंग में मलबा अधिक भरने की वजह से उसे हटाने में समय अधिक लग रहा है। केन्द्र सरकार का भी पूरा सहयोग है और सबसे अहम यह कि खुद की जान जोखिम में डालकर वहां जवान जिंदगी बचाने में प्रयासरत हैं। प्रभावित क्षेत्र की बराबर मॉनिटरिंग की जा रही है।

चर्चा की टेबल पर पूर्व सीएम हरीश रावत समेत अन्य ने रैणी क्षेत्र में राहत एवं बचाव कार्यों के लिए सीएम त्रिवेंद्र के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस त्वरित कार्रवाई से स्थिति काफी हद तक नियंत्रित हुई है। उन्होंने 6 सूत्रीय ज्ञापन भी सीएम को सौंपा जिसमें प्रभावित क्षेत्रों के लोगों का विस्थापन, आपदा के कारणों की तह तक जाने, परियोजनाओं का सेफ्टी ऑडिट कराने आदि की बात कही गई है।

विपक्षी नेताओं के सुझावों को सीएम त्रिवेंद्र ने पूरी शिद्दत के साथ सुना और लोकतंत्र में विपक्ष की भावनाओं का जिस तरह से आदर किया जाना चाहिए वह किया। अन्यथा दो दशक का सफर पूरा कर चुके उत्तराखंड में कई उदाहरण ऐसे भी हैं जब सत्ताधारी दल के मुखिया ने कुर्सी के गुरूर में आपदा तक के मौकों पर भी विपक्ष के निवेदन के बावजूद उनसे बात करने तक को जरूरी नहीं समझा।

सीएम त्रिवेंद्र ने लोकतंत्र की उस स्वस्थ परंपरा को फिर से शुरू कर दिया है जिसकी बीते सत्रह सालों से यहां जरूरत महसूस की जा रही थी। निसंदेह ही यह लोकतंत्र के हित में बेहतर कार्य हुआ है। ‘समझनी होती है सामने की तासीर भी हरगिज, यूं ही कोई त्रिवेंद्र नहीं हो जाता।’

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Hill Mail

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