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उत्तराखंड न्यूज़पौड़ी गढ़वालरुद्रप्रयागसरोकार

सूने स्कूल, सिमटती शिक्षा: पौड़ी में 23 विद्यालयों पर ताला, बढ़ता संकट

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में सरकारी शिक्षा व्यवस्था की हकीकत चिंताजनक रूप से सामने आ रही है। एक ओर सरकार शिक्षा को मजबूत करने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घट रही है। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि शिक्षा सत्र 2026-27 की शुरुआत में ही जिले के 23 विद्यालयों में एक भी छात्र नामांकित नहीं मिला, जिसके चलते इन पर ताला लगाना पड़ा।

इन बंद हुए विद्यालयों में 20 राजकीय प्राथमिक और 3 राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय शामिल हैं। जिले में कुल 1329 प्राथमिक और 241 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं, लेकिन घटती छात्र संख्या ने इन संस्थानों के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते सात वर्षों में ही 146 प्राथमिक विद्यालय बंद हो चुके हैं, जो शिक्षा व्यवस्था के कमजोर होते ढांचे की ओर इशारा करता है।
अगर राज्य गठन के समय की स्थिति से तुलना करें तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। उस समय जिले में 1684 प्राथमिक और 298 उच्च प्राथमिक विद्यालय थे। अब यह संख्या घटकर क्रमशः 1309 और 238 रह गई है। यानी राज्य गठन के बाद अब तक कुल 435 विद्यालय बंद हो चुके हैं, जिनमें 375 प्राथमिक और 60 उच्च प्राथमिक विद्यालय शामिल हैं।
शिक्षा विभाग के अनुसार, इस समस्या की सबसे बड़ी वजह पहाड़ों से हो रहा लगातार पलायन है। गांव खाली होते जा रहे हैं, जिससे स्कूलों में बच्चों की संख्या तेजी से घट रही है। इसके अलावा दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां, जंगली जानवरों का खतरा और शिक्षकों पर गैर-शैक्षिक कार्यों का बढ़ता बोझ भी प्रमुख कारण हैं।
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के समाज विज्ञानी प्रो. एमएम सेमवाल का मानना है कि राज्य में सरकारी शिक्षा का दायरा लगातार सिमट रहा है और इसे बचाने के लिए बड़े स्तर पर सुधार जरूरी हैं। उनका सुझाव है कि सरकार को निजीकरण पर नियंत्रण करते हुए आधुनिक सुविधाओं से युक्त मॉडल स्कूलों की स्थापना करनी चाहिए, ताकि अभिभावकों का भरोसा सरकारी स्कूलों पर दोबारा कायम हो सके।
वहीं, शिक्षक संघ के जिलाध्यक्ष मनोज जुगरान का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार प्रयास कर रही है, लेकिन अभी और ठोस कदम उठाने की जरूरत है। विभाग ने हाल ही में प्रवेशोत्सव जैसे कार्यक्रमों के जरिए छात्रों की संख्या बढ़ाने की कोशिश की है, जिसमें कुछ क्षेत्रों में सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले हैं।
स्पष्ट है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो पहाड़ों में सरकारी शिक्षा व्यवस्था और अधिक कमजोर हो सकती है। यह केवल स्कूलों के बंद होने का मुद्दा नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज के भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल है।

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