देहरादून की अव्यवस्था का जिम्मेदार कौन ?

देहरादून की अव्यवस्था का जिम्मेदार कौन ?

देहरादून कभी शांति, अनुशासन और संतुलित जीवनशैली वाला शहर था। यह एक ऐसा शहर था, जहां शिक्षा और सादगी उसकी असली पहचान थी। लेकिन अब शहर की तस्वीर बदल चुकी है। जहां कभी कानून की ताकत थी, अब उसका असर धीरे-धीरे फीका पड़ता दिख रहा है, और अव्यवस्था की छाया फैलती जा रही है।

आज सुबह, राजपुर रोड की परिचित सड़क पर, एक सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर अपनी रोज़मर्रा की सबसे सुरक्षित मानी जाने वाली दिनचर्या सुबह की सैर के लिए निकले। लेकिन वे वापस नहीं लौटे।

रोड रेज की एक घटना में हुई गोलीबारी के बीच फंसकर, ब्रिगेडियर उस शहर में ‘कोलैटरल डैमेज’ बन गए, जिसे उन्होंने वर्दी में सेवा देने के बाद शांति के लिए चुना था। यह सिर्फ एक अपराध नहीं है, यह एक गहरा सामाजिक संकेत है।

एक बदलता हुआ शहर

देहरादून कभी एक शांत, संतुलित और अनुशासित शहर के रूप में जाना जाता था। एक कैंटोनमेंट, जहां शिक्षा, सादगी और सुरक्षित जीवनशैली इसकी पहचान थी। लेकिन आज तस्वीर बदलती हुई नजर आ रही है। एक ऐसा शहर, जहां कानून का प्रभाव कमजोर पड़ता दिखता है और अव्यवस्था धीरे-धीरे अपनी जगह बना रही है।

समस्या केवल एक घटना नहीं

यह घटना अलग-थलग नहीं लगती, बल्कि एक बड़े सिस्टम की कमजोरियों को उजागर करती है। सार्वजनिक स्थानों का हिंसक टकराव में बदलना, रोड रेज का सशस्त्र संघर्ष में परिवर्तित होना, भू-माफिया की बढ़ती सक्रियता, नशे, अवैध गतिविधियों और असामाजिक नेटवर्क का विस्तार, युवाओं और छात्रों को नशे की ओर धकेला जाना, अनियंत्रित रियल एस्टेट के जरिए संदिग्ध गतिविधियों को पनाह मिलना, पुलिस व्यवस्था पर घटता विश्वास राजनीतिक संरक्षण से अपराधियों का मनोबल बढ़ना। यह शहरी विकास नहीं, बल्कि संस्थागत कमजोरी का संकेत है।

एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी की इस तरह मौत केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है — यह एक प्रतीक है। एक ऐसा व्यक्ति, जिसने जीवन भर अनुशासन, व्यवस्था और नियंत्रित शक्ति के सिद्धांतों का पालन किया, वही अंततः अराजकता का शिकार हो गया। यह एक खतरनाक सवाल उठाता है, जो व्यवस्था के रक्षक थे, क्या वे अब उसी व्यवस्था में सुरक्षित हैं?

सामाजिक जिम्मेदारी का प्रश्न

समस्या केवल अपराधियों या व्यवस्था तक सीमित नहीं है यह समाज के भीतर भी झांकने का समय है। जब विरोध की जगह लोग चुप्पी चुनते हैं, जब समुदाय बिखरने लगते हैं, जब आक्रोश क्षणिक रह जाता है और जब ‘एडजस्ट करना’ सामान्य बन जाता है। तब पतन बाहर से नहीं आता — वह भीतर से पनपता है।

जैसा कि एयन रण्ड ने अपनी रचनाओं में संकेत दिया है — जब संस्थाएं खोखली हो जाती हैं और नैतिकता की जगह समझौता ले लेता है, तो समाज बाहर से चलता हुआ दिखता है, लेकिन भीतर से टूटने लगता है। आज देहरादून उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है।

अब सीधा सवाल

यह घटना एक कड़ा प्रश्न छोड़ती है, अगर एक सम्मानित सैन्य अधिकारी भी सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की सुरक्षा कहां है?

आज विकल्प साफ हैं। या तो इस गिरावट का सामना किया जाए या इसे सामान्य मान लिया जाए। क्योंकि असली खतरा यह नहीं है कि आज एक सैनिक मारा गया — असली खतरा यह है कि कल ऐसी घटनाएं हमें चौंकाना बंद कर देंगी।

– ब्रिगेडियर सर्वेश दत्त डंगवाल

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