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उत्तराखंड अभी पूरा नहीं हुआ है… मेरे सपनों का पहाड़ अधूरा है: दिवाकर भट्ट

दिवाकर भट्ट सिर्फ एक नेता नहीं थे, वे उत्तराखंड आंदोलन की धड़कन थे। 1994 से लेकर राज्य बनने तक हर मोर्चे पर उनका चेहरा जिद, साहस और जनता की बेबसी के बीच खड़ा दिखा। भीड़, लाठीचार्ज, गिरफ्तारी, गोली का आदेश सबका सामना करते हुए उन्होंने पहाड़ की आवाज़ दिल्ली तक पहुंचाई। UKD के माध्यम से उन्होंने पहाड़ की राजनीति को नई पहचान दी। उनका जाना पहाड़ की अस्मिता का सबसे बड़ा नुकसान है।

उत्तराखंड आंदोलन की यादों को जब भी पलटा जाता है, एक चेहरा हमेशा सबसे आगे दिखाई देता है दिवाकर भट्ट। सफेद दाढ़ी, तेज़ निगाहें, और भीड़ के बीच खड़े होकर आवाज़ बुलंद करने का साहस। वो सिर्फ नारे लगाने वाले नेता नहीं थे, बल्कि उस आंदोलन की आत्मा थे जिसने पहाड़ के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ी।

सन 1994–95 का दौर था। श्रीनगर से श्रीकोट तक आंदोलन उग्र हो चुका था। पहाड़ी कस्बों की गलियों में धुएँ की गंध, नाकेबंदी, पुलिस का भारी दबाव और जनता की उम्मीदें सब एक साथ चल रहे थे। इसी उथल-पुथल के बीच दिवाकर भट्ट उभर रहे थे। उनकी मौजूदगी भीड़ को दिशा देती थी और उनकी आवाज़ संघर्ष को ऊर्जा देती थी। लोग कहते हैं कि भट्ट की बात में ऐसा भरोसा था कि थके हुए आंदोलनकारी भी फिर से खड़े हो जाते थे। उनकी विश्वसनीयता का सबसे बड़ा कारण था खुद खतरा उठाकर लोगों के साथ खड़े रहना। जिस मोर्चे पर डर सबसे ज्यादा होता था, दिवाकर भट्ट वहीं दिखाई देते। जहां प्रशासन आंदोलनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेड लगा देता, वहीं भट्ट सबसे पहले पहुँचते। पत्र के अनुसार, कई ऐसे स्थल थे जहाँ जाते ही तनाव बढ़ जाता था, लेकिन उनकी रणनीति साफ थी अगर सत्ता गलत कर रही है, तो उसी जगह खड़े होकर जवाब मांगो।

आंदोलन का एक भयावह पहलू भी उनके जीवन से जुड़ा। कई मौकों पर पुलिस-प्रशासन ने उन्हें “खतरा” मानकर सीधा निशाना बनाने की कोशिश की। एक समय तो रिपोर्ट्स के अनुसार उन पर गोली चलाने तक का आदेश दिया गया था। यह सामान्य बात नहीं थी एक आंदोलनकारी नेता पर इतना गुस्सा, इतना भय तभी होता है जब वह सत्ता को सचमुच चुनौती दे रहा हो। लेकिन दिवाकर भट्ट पीछे नहीं हटे। पुलिसिया दबाव, गिरफ्तारी का डर, जान का खतरा इन सबके बीच भी वे उसी आक्रामकता के साथ आगे बढ़ते रहे। उनका आक्रामक तेवर सिर्फ भीड़ को energize करने के लिए नहीं था। यह उनके भीतर का दर्द था, वो पीड़ा थी जिसे पहाड़ की हर माँ, हर युवा और हर बुजुर्ग ने सालों तक झेला था। पलायन, बेरोजगारी, पहचान की लड़ाई इन सबके बीच दिवाकर भट्ट वह नेता थे जिनकी भाषा पहाड़ के आम आदमी की भाषा थी।

राज्य बनने के बाद कई आंदोलनकारी पीछे हट गए, कुछ राजनीति के पर्दे में खो गए। लेकिन दिवाकर भट्ट का संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ। उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाया। UKD का विचार सिर्फ राजनीति नहीं था, यह पहाड़ का अपना प्लेटफॉर्म था जिसमें पहाड़ी आवाज़ बिना समझौते के उठती थी। गैरसैंण की राजधानी की मांग हो, पहाड़ी युवाओं के रोजगार का मुद्दा हो, या पलायन पर कड़े कदम उठाने की बात दिवाकर भट्ट इन सवालों को लगातार उठाते रहे।

उनकी राजनीति अलग थी। उनमें सत्ता का लालच नहीं था। वे बड़े दलों के दबाव में कभी झुके नहीं। पहाड़ की अस्मिता उनके लिए हमेशा पहले नंबर पर रही। यही कारण था कि चाहे आंदोलन का दौर हो या बाद की राजनीति लोग उन्हें भरोसे के प्रतीक की तरह देखते रहे। उनके जीवन का अंतिम अध्याय भी उतना ही भावुक और संघर्षशील था। एक महीने पहले दिए एक बयान में उन्होंने कहा था, “उत्तराखंड अभी पूरा नहीं हुआ है… मेरे सपनों का पहाड़ अधूरा है।” यह सुनकर लगता है कि वे केवल आंदोलन के नेता नहीं थे, बल्कि वह इंसान थे जिसने जीवनभर पहाड़ के सपने देखे और उन्हें पूरा करने के लिए हर कदम उठाया।

उनके निधन की खबर के साथ ही उत्तराखंड की राजनीति और आंदोलन दोनों में एक खालीपन उतर आया। पहाड़ ने सिर्फ एक नेता नहीं खोया, बल्कि एक ऐसी आवाज़ खो दी जो सच बोलने से कभी नहीं डरी, जो हर मुश्किल मोड़ पर जनता की ढाल बनकर खड़ी रही। दिवाकर भट्ट की विरासत आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाएगी कि संघर्ष का रास्ता कठिन हो सकता है, पर अगर नीयत साफ और विश्वास अडिग हो, तो इतिहास बदला जा सकता है।

दिवाकर भट्ट चले गए, लेकिन पहाड़ में गूंजता उनका स्वर शायद कभी शांत नहीं होगा। यह वही आवाज़ है जिसने एक राज्य को जन्म दिया, और एक पीढ़ी को लड़ना सिखाया।

Written by
Hill Mail

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