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दून–मसूरी रोड का जाम: पर्यटन की राह में सबसे बड़ी रुकावट

देहरादून से मसूरी को जोड़ने वाला दून-मसूरी मार्ग एक बार फिर अपने पुराने दर्द-ट्रैफिक जाम से जूझ रहा है। हर साल की तरह इस बार भी वीकेंड और पर्यटन सीजन की शुरुआत होते ही सड़क पर वाहनों का दबाव बढ़ गया है, जिससे लंबा जाम अब आम स्थिति बन चुकी है।

मसूरी, जिसे ‘पहाड़ों की रानी’ कहा जाता है, देश-विदेश से लाखों पर्यटकों को आकर्षित करता है। लेकिन इस आकर्षण तक पहुंचने का रास्ता अक्सर घंटों की परेशानी में बदल जाता है। सीमित सड़क क्षमता, अव्यवस्थित पार्किंग और कमजोर ट्रैफिक प्रबंधन इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं।

यहां होता है सबसे अधिक जाम

जाम के प्रमुख हॉटस्पॉट में शिव मंदिर, बैली ब्रिज, कुलड़ी और लाइब्रेरी चौक शामिल हैं। इन स्थानों पर हर सीजन में ट्रैफिक रुक-रुक कर चलता है, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों दोनों को भारी असुविधा होती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या की जड़ सिर्फ बढ़ती भीड़ नहीं, बल्कि उसके अनुसार बुनियादी ढांचे का विकास न होना भी है। सड़कें वर्षों पुरानी हैं, लेकिन वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ चुकी है। पार्किंग की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण लोग सड़क किनारे वाहन खड़े कर देते हैं, जिससे जाम और भी विकराल हो जाता है।

प्रशासन हर साल अस्थायी उपाय अपनाता है – जैसे ट्रैफिक डायवर्जन, अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती और बस सेवाओं में वृद्धि। हालांकि, ये कदम केवल तात्कालिक राहत देते हैं, स्थायी समाधान नहीं बन पाते। नतीजतन, हर पर्यटन सीजन में वही समस्या दोहराई जाती है।

इस स्थिति का असर केवल यातायात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यटन की छवि को भी प्रभावित करता है। अगर किसी पर्यटक का अनुभव घंटों जाम में फंसे रहने का हो, तो वह दोबारा यहां आने से कतराता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ सकता है।

स्थायी समाधान की जरूरत

विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों के अनुसार, इस समस्या के समाधान के लिए दीर्घकालिक योजना बनाना जरूरी है। मल्टी-लेवल पार्किंग, शटल सेवा को अनिवार्य करना, वीकेंड पर वाहनों की संख्या सीमित करना और वैकल्पिक मार्गों का विकास जैसे कदम प्रभावी हो सकते हैं। साथ ही, ट्रैफिक प्रबंधन में आधुनिक तकनीक का उपयोग और सख्त नियमों का पालन भी समय की मांग है।

दून–मसूरी मार्ग का जाम अब केवल एक मौसमी परेशानी नहीं, बल्कि एक स्थायी चुनौती बन चुका है। यदि समय रहते ठोस और दीर्घकालिक कदम नहीं उठाए गए, तो ‘पहाड़ों की रानी’ तक पहुंचने का सफर और भी मुश्किल होता जाएगा।

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Hill Mail

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