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एनडीआरआई के डॉ. मनमोहन सिंह चौहान को मिली भारतीय विज्ञान अकादमी की फेलोशिप

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राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (एनडीआरआई-नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यूट) करनाल के निदेशक डा. मनमोहन सिंह चौहान को भारतीय विज्ञान अकादमी की फेलोशिप मिली है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कृषि अनुसंधान क्षेत्र में 1935 से अब तक केवल दस वैज्ञानिकों को यह स्थान प्राप्त हुआ है। एनडीआरआई के जनसंपर्क अधिकारी डा. एके डांग ने यह जानकारी दी उन्होंने बताया कि एनडीआरआई से डा. मनमोहन सिंह चौहान पहले वैज्ञानिक हैं जिन्हें इस पुरस्कार के लिए चुना गया है।

उन्होंने बताया कि यह पुरस्कार पांच अक्तूबर को नई दिल्ली में आयोजित अकादमी की वार्षिक आम बैठक में घोषित किया गया था। यह फेलोशिप भारत में वैज्ञानिक ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जिसमें राष्ट्रीय कल्याण की समस्याओं के व्यावहारिक अनुप्रयोग भी शामिल हैं। डा. चौहान नेशनल एकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के फेलो, नेशनल एकेडमी ऑफ डेयरी साइंसेज के फेलो व सोसाइटी ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन के फेलो हैं।

आईसीएआर – केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान के निदेशक डा. मनमोहन सिंह चौहान भारत में जानवरों की क्लोनिंग के क्षेत्र में एक बड़ा नाम हैं। डा. चौहान राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान, करनाल में प्रधान वैज्ञानिक (पशु जैव प्रौद्योगिकी) के पद पर कार्यरत रहे। गाय, भैंस, याक एवं बकरी से जुड़े अनुसंधान के क्षेत्र में डा. चौहान को काफी ख्याति हासिल है। उन्होंने अनुसंधान के 32 वर्षों में पशुधन कार्यकुशलता के लिए अनेक क्षमतावान जनन जैव प्रौद्योगिकी विकसित की हैं।

डा. चौहान ने गाय, भैंस, बकरी एवं याक जानवरों में टेस्ट ट्यूब बेबी की तकनीकी के (इनविट्रो भ्रूण) महत्वपूर्ण एवं आसान तरीके विकसित किए हैं। डा. चौहान के नाम विश्व में सबसे पहले भैंस की कटिया का क्लोन ‘गरिमा 2’ तैयार करने का रिकॉर्ड है। उन्होंने एम्ब्रयोनिक स्टेम सेल से यह उपलब्धि हासिल की। उन्होंने भैंस के कान के टुकड़े से 14 भैंस तैयार की। उनके नाम भारत में पहला ओपीयू-आईवीएफ साहीवाल बछड़ा तैयार करने का भी रिकॉर्ड है।

डा. मनमोहन सिंह चौहान कई पुरूस्कार मिल चुके हैं जिनमें आईसीएआर की ओर से 2015 में रफी अहमद किदवई पुरस्कार, एनएएएस द्वारा डा. पी. भट्टाचार्य मेमोरियल अवार्ड 2020, आईएआरआई द्वारा राव बहादुर बी विश्वनाथ पुरस्कार 2019, कृषि विज्ञान में वासविक औद्योगिक पुरस्कार 2015, पशु विज्ञान में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-टीम पुरस्कार 2014, आईएसएसआरएफ द्वारा डा. लाभसेटवार पुरस्कार-2016, डीबीटी बायोटेक्नोलॉजी ओवरसीज फेलोशिप अवार्ड 1997, वर्जीनिया टेक यूएसए द्वारा डेयरी साइंस में अनुकरणीय अनुसंधान पुरस्कार 1999 तथा 2009 में जर्मनी का दौरा करने वाले वैज्ञानिक, 2009 में यूरोपीय इरास्मस मुंडस छात्रवृत्ति पुरस्कार और 2021 में एनएएएस अकादमी के कार्यकारी परिषद सदस्य के रूप में सम्मान मिला है।

डा. चौहान ने अब तक 125 शोध पत्र, 2 पुस्तक, 90 वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रकाशन प्रकाशित किए है। उत्तराखंड के मूल निवासी होने के कारण डा. चौहान का यहां के गरीब किसानों के उत्थान के लिए विशेष ध्यान रहता है। उनके निर्देशन में उत्तराखंड में बकरी उत्थान के लिए कई कैंप लगाए जा चुके हैं।

डा. मनमोहन सिंह चौहान का जन्म 5 जनवरी, 1960 को पौड़ी गढ़वाल के यमकेश्वर के जामल गांव में हुआ। जयहरीखाल से हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और बीएससी करने के बाद डा. चौहान ने 1981 में श्रीनगर, गढ़वाल से एमएससी की। पंजाब कृषि यूनिवर्सिटी जाकर पीएचडी का थीसिस लिखा। मनमोहन सिंह चौहान को 1986 में पीएचडी की डिग्री मिली।

Written by
Y S Bisht

लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद कई टीवी प्रोग्राम के लिए काम किया। एशिया डिफेंस न्यूज़ इंटरनेशनल (अडनी) से जुड़े। यह एजेंसी हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मणिपुरी और असमिया में अपनी सेवाएं देती है। इसके अलावा एशिया डिफेंस न्यूज के नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकालती थी। वर्ष 2013 में जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों को लेकर हिल-मेल वेबसाइट शुरू की। फरवरी 2016 से हिल-मेल में बतौर संपादक कार्यरत। मूल रूप से पौड़ी गढ़वाल के निवासी हैं।

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