ऊर्जा विभाग की ओर से इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए एक कोर वर्किंग ग्रुप गठित किया जा रहा है। यह समूह ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण, अनुसंधान और उपयोग से जुड़े विभिन्न पहलुओं का अध्ययन करेगा तथा राज्य के लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करेगा। सरकार का उद्देश्य उत्तराखंड को देश के प्रमुख ग्रीन हाइड्रोजन केंद्रों में शामिल करना है।
प्रस्तावित योजना के तहत हरिद्वार, उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ सहित कई जिलों में ग्रीन हाइड्रोजन वैली विकसित की जाएगी। इन क्षेत्रों को भविष्य में ऊर्जा उत्पादन, अनुसंधान और नवाचार के केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना है। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां और नवीकरणीय ऊर्जा संसाधन ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र के विकास के लिए अनुकूल साबित हो सकते हैं।
दरअसल, राज्य में जलविद्युत उत्पादन लंबे समय से ऊर्जा का प्रमुख स्रोत रहा है। लेकिन पर्यावरणीय चुनौतियों, न्यायालयी प्रक्रियाओं और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में परियोजनाओं को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण कई बड़ी जलविद्युत योजनाओं का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। विशेष रूप से अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिन में प्रस्तावित लगभग 2121 मेगावाट क्षमता वाली परियोजनाओं को लेकर कई प्रकार की चुनौतियां सामने हैं। ऐसे में सरकार वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है।
ग्रीन हाइड्रोजन को ऊर्जा क्षेत्र का भविष्य माना जा रहा है। यह पूरी तरह स्वच्छ ईंधन है, जिसके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य रहता है। वैश्विक स्तर पर भी कई देश पारंपरिक ईंधनों के स्थान पर ग्रीन हाइड्रोजन को अपनाने की दिशा में तेजी से कार्य कर रहे हैं। उत्तराखंड सरकार भी इसी वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन का हिस्सा बनने की तैयारी कर रही है।
राज्य सरकार ने वर्ष 2030 तक प्रतिवर्ष 100 किलोटन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस उत्पादन का उपयोग स्टील, रिफाइनरी, उर्वरक, सीमेंट और अन्य ऊर्जा-गहन उद्योगों में किया जा सकेगा। इससे न केवल उद्योगों की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्य भी हासिल किए जा सकेंगे।
निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकार ने कई विशेष प्रोत्साहन भी घोषित किए हैं। ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाओं में निवेश करने वाले उद्योगों को 10 वर्षों तक बिजली ट्रांसमिशन शुल्क और परिवहन शुल्क में 50 प्रतिशत तक छूट प्रदान की जाएगी। इसके अलावा इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन और व्हीलिंग शुल्क में भी 50 प्रतिशत की राहत मिलेगी। बिजली शुल्क, अतिरिक्त अधिभार और क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज में 100 प्रतिशत छूट देने का भी प्रावधान किया गया है।
सरकार भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन आधारित वाहनों को बढ़ावा देने की भी योजना बना रही है। यदि हाइड्रोजन ईंधन का उपयोग परिवहन क्षेत्र में शुरू होता है तो ऐसे वाहनों को मोटरयान कर में विशेष छूट प्रदान की जाएगी। इससे स्वच्छ परिवहन व्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा।
ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि ग्रीन हाइड्रोजन क्षेत्र के विकास के लिए कोर वर्किंग ग्रुप का गठन किया जा रहा है। इसकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की रणनीति और कार्ययोजना तय की जाएगी। उन्होंने कहा कि राज्य में बिजली उत्पादन बढ़ाने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जलविद्युत के साथ-साथ अन्य आधुनिक ऊर्जा स्रोतों का विकास भी आवश्यक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह योजना सफल होती है तो उत्तराखंड न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में अग्रणी राज्य बन सकता है, बल्कि रोजगार, निवेश, अनुसंधान और स्टार्टअप गतिविधियों के नए अवसर भी पैदा होंगे। ग्रीन हाइड्रोजन वैली परियोजना राज्य की ऊर्जा व्यवस्था को नई दिशा देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकती है।


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