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65 की उम्र में भी थमी नहीं कला की धार, रिंगाल को पहचान दिला रहे दरमानी लाल

उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली की बंड पट्टी का किरुली गांव आज जिस पहचान से जाना जा रहा है, उसके पीछे 65 वर्षीय शिल्पकार दरमानी लाल की चार दशकों से अधिक की साधना छिपी है। जिस उम्र में लोग आमतौर पर सीमित जीवन और विश्राम को प्राथमिकता देने लगते हैं, उस पड़ाव पर दरमानी लाल अपनी कला को नई ऊँचाइयों तक पहुंचाने में जुटे हैं।

42 वर्षों की साधना, रिंगाल से जीवन का निर्माण

दरमानी लाल पिछले 42 वर्षों से रिंगाल (पहाड़ी बांस) को आकार देकर उसे उपयोगी, आकर्षक और पर्यावरण-अनुकूल उत्पादों में बदल रहे हैं। उनके हाथों से बने कलमदान, लैंप शेड, चाय ट्रे, नमकीन ट्रे, डस्टबिन, फूलदान, टोकरियां, टोपी और स्ट्रॉ न केवल स्थानीय जरूरतों को पूरा करते हैं, बल्कि शहरी बाजारों में भी खास पहचान बना चुके हैं।

उनके उत्पादों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे प्लास्टिक का पर्यावरण-हितैषी विकल्प हैं। रिंगाल से बने ये उत्पाद टिकाऊ, हल्के और सौंदर्यपूर्ण होने के साथ-साथ पहाड़ की पारंपरिक पहचान को भी संजोए हुए हैं।

कलाकार से गुरु तक का सफर

दरमानी लाल केवल एक शिल्पकार नहीं हैं, बल्कि वे एक कुशल प्रशिक्षक और मार्गदर्शक भी हैं। वे मास्टर ट्रेनर के रूप में कई युवाओं और स्थानीय लोगों को रिंगाल हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दे चुके हैं। उनके प्रशिक्षण से अनेक लोग स्वरोजगार की ओर बढ़े हैं और अपनी आजीविका को मजबूत कर रहे हैं।

उनका मानना है कि यदि पारंपरिक शिल्प को आधुनिक डिजाइन, बेहतर मार्केटिंग और सरकारी सहयोग मिले, तो यह आज के युवाओं के लिए भी एक सम्मानजनक और स्थायी रोजगार बन सकता है।

विरासत के संकट और उम्मीद की किरण

उत्तराखंड में आज भी करीब 50 हजार से अधिक हस्तशिल्पी रिंगाल, बांस, नेटल फाइबर, ऐपण और काष्ठ शिल्प जैसी पारंपरिक कलाओं को जीवित रखे हुए हैं। ये कलाएं केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि राज्य की सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार हैं।

दुर्भाग्य से बदलते समय और रोजगार की तलाश में युवा पीढ़ी का रुझान इन पुश्तैनी व्यवसायों से लगातार कम हो रहा है। ऐसे में दरमानी लाल जैसे कलाकार न केवल परंपरा को बचा रहे हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए रास्ता भी दिखा रहे हैं।

सरकारी सहयोग की जरूरत

विशेषज्ञों और शिल्पकारों का मानना है कि यदि सरकार रिंगाल और अन्य हस्तशिल्प कलाओं को प्रशिक्षण, डिजाइन नवाचार, वित्तीय सहायता और बाजार उपलब्धता के माध्यम से प्रोत्साहित करे, तो यह क्षेत्र उत्तराखंड की आर्थिकी की मजबूत रीढ़ बन सकता है।

ई-कॉमर्स, पर्यटन स्थलों पर आउटलेट, प्रदर्शनियों और निर्यात के अवसरों से इन उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई जा सकती है।

परंपरा और संभावनाओं का संगम

दरमानी लाल की कहानी यह साबित करती है कि उम्र कभी भी सृजन की सीमा नहीं बन सकती। उनकी मेहनत, लगन और कला के प्रति समर्पण आज उत्तराखंड के पारंपरिक हस्तशिल्प के लिए उम्मीद की एक मजबूत रोशनी है।

यह कहानी सिर्फ एक शिल्पकार की नहीं, बल्कि उस विरासत की है जिसे अगर आज संभाल लिया गया, तो आने वाला कल आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बन सकता है।

Written by
Hill Mail

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