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जंगल की आग बनी मौत का तांडव, फायर वाचर और महिला की जिंदा जलकर दर्दनाक मौत

उत्तराखंड में बढ़ती वनाग्नि अब केवल जंगलों को ही नहीं, बल्कि इंसानी जिंदगी को भी निगलने लगी है। चमोली और टिहरी जिलों में जंगल की आग बुझाने और उसे आबादी तक पहुंचने से रोकने की कोशिश कर रहे दो लोगों की दर्दनाक मौत ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। चमोली में फायर वाचर राजेंद्र सिंह नेगी और टिहरी में अंजू देवी आग की लपटों में घिर गए और अपनी जान गंवा बैठे। दोनों घटनाओं के बाद वन विभाग और प्रशासन में हड़कंप मच गया है। वन मंत्री सुबोध उनियाल ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं।

चमोली जिले में बदरीनाथ हाईवे के पास चीड़ के जंगल में बृहस्पतिवार दोपहर करीब दो बजे आग लगने की सूचना मिली। आग तेजी से फैल रही थी और आसपास के क्षेत्र को खतरा पैदा हो गया था। सूचना मिलते ही चमोली रेंज से वन कर्मियों की 15 सदस्यीय टीम मौके पर भेजी गई। इस टीम में 42 वर्षीय फायर वाचर राजेंद्र सिंह नेगी भी शामिल थे, जो लंबे समय से वन विभाग के साथ कार्य कर रहे थे।

बदरीनाथ वन प्रभाग के डीएफओ सर्वेश दुबे के अनुसार, रात करीब साढ़े आठ बजे वन कर्मियों ने राजेंद्र सिंह नेगी के लापता होने की सूचना अधिकारियों को दी। हालात की गंभीरता को देखते हुए डीएफओ स्वयं मौके पर पहुंचे और पुलिस प्रशासन को सूचना दी गई। एसपी सुरजीत सिंह पंवार के निर्देश पर एसडीआरएफ और वन विभाग की संयुक्त टीम ने जंगल में खोज अभियान शुरू किया।

रात करीब साढ़े दस बजे जंगल में राजेंद्र का मोबाइल फोन मिला, लेकिन उनका कोई पता नहीं चल सका। अंधेरा और दुर्गम परिस्थितियों के चलते रात में रेस्क्यू अभियान रोकना पड़ा। अगले दिन सुबह फिर से खोज अभियान चलाया गया। काफी तलाश के बाद राजेंद्र सिंह का शव जंगल में करीब 70 मीटर गहरी खाई में बुरी तरह झुलसी अवस्था में मिला। माना जा रहा है कि आग से बचने की कोशिश में वह खाई में गिर गए होंगे।

राजेंद्र सिंह नेगी की मौत के बाद वन विभाग के कर्मचारियों में शोक की लहर है। विभागीय कर्मियों ने सरकारी सहायता के अतिरिक्त अपने एक दिन का वेतन उनके परिवार को देने का निर्णय लिया है। ग्रामीणों ने भी राजेंद्र को मेहनती और बहादुर कर्मी बताते हुए उनके परिवार को उचित सहायता देने की मांग की है।

उधर, टिहरी जिले की ग्राम पंचायत पैंडुला के पिपोला तोक में भी दर्दनाक हादसा हुआ। यहां 50 वर्षीय अंजू देवी जंगल से लकड़ी और चारापत्ती लेने गई थीं। इसी दौरान उन्होंने देखा कि जंगल में आग तेजी से फैल रही है और उनके खेतों की ओर बढ़ रही है। खेतों और फसलों को बचाने के प्रयास में अंजू देवी आग बुझाने लगीं, लेकिन तेज हवा के कारण आग ने अचानक विकराल रूप ले लिया और वह उसकी चपेट में आ गईं।

शाम तक घर वापस न लौटने पर उनके बेटे और ग्रामीणों ने तलाश शुरू की। देर रात करीब साढ़े आठ बजे अंजू देवी का झुलसा शव जंगल में मिला। ग्रामीणों के अनुसार, महिला आग की लपटों में पूरी तरह घिर गई थीं और बचने का मौका नहीं मिल पाया।

इन दोनों घटनाओं ने राज्य में बढ़ती वनाग्नि की भयावहता को उजागर कर दिया है। हर वर्ष गर्मियों में उत्तराखंड के जंगल आग की चपेट में आते हैं, लेकिन इस बार हालात अधिक चिंताजनक नजर आ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों में सूखी पत्तियां, चीड़ की गिरी सुइयां और बढ़ती गर्मी आग को तेजी से फैलाने का कारण बन रही हैं। अब जरूरत है कि वनाग्नि रोकने के लिए मजबूत रणनीति और जागरूकता अभियान चलाए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी दर्दनाक घटनाओं को रोका जा सके।

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Hill Mail

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