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गढ़वाल राइफल्स के पूर्व अधिकारी बने बिहार के राज्यपाल

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का जीवन समर्पण, नेतृत्व और राष्ट्रसेवा की एक प्रेरणादायक कहानी है। भारतीय सेना की गौरवशाली परंपरा से जुड़ी गढ़वाल राइफल्स से शुरू हुआ उनका सफर आज राजभवन, बिहार तक पहुंच चुका है। यह यात्रा बताती है कि कर्तव्यनिष्ठा और मेहनत के बल पर एक सैनिक किस तरह देश के सर्वोच्च पदों तक अपनी पहचान बना सकता है।

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन को साल 1974 में भारतीय सेना में कमीशन मिला और उन्होंने गढ़वाल राइफल्स की चौथी बटालियन से अपने सैन्य जीवन की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने लगभग चार दशकों तक देश की सेवा करते हुए कई महत्वपूर्ण अभियानों और जिम्मेदारियों का नेतृत्व किया। चाहे आतंकवाद विरोधी अभियान हों, कठिन सीमाई परिस्थितियां हों या आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां—हर मोर्चे पर उन्होंने अपने नेतृत्व और रणनीति से सेना का गौरव बढ़ाया।

जम्मू-कश्मीर में 15 कोर के कमांडर के रूप में उन्होंने सुरक्षा के साथ-साथ जनता का विश्वास जीतने की नीति को भी प्राथमिकता दी। उनके नेतृत्व में सेना और आम नागरिकों के बीच संवाद और विश्वास को मजबूत करने की पहल की गई, जिसने उन्हें एक संवेदनशील और दूरदर्शी सैन्य नेता के रूप में पहचान दिलाई। उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल, उत्तम युद्ध सेवा मेडल, अति विशिष्ट सेवा मेडल, सेना मेडल, विशिष्ट सेवा मेडल और बार जैसे कई सम्मान भी प्राप्त हुए।

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन का उत्तराखंड से गहरा संबंध रहा है। उनकी शिक्षा शेरवुड कॉलेज, नैनीताल में हुई और गढ़वाल राइफल्स के साथ उनका लंबा जुड़ाव उन्हें पहाड़ की वीर परंपरा से जोड़ता है। यही कारण है कि उत्तराखंड के लोगों के लिए उनकी उपलब्धियां गर्व और प्रेरणा का विषय हैं।

सेना से सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक मामलों पर अपना योगदान जारी रखा और देश के विभिन्न मंचों पर अपने अनुभव साझा किए। वे राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के सदस्य के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। अब जब उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया है, तो यह उनके लंबे सैन्य और सार्वजनिक जीवन में किए गए योगदान का सम्मान है।

गढ़वाल राइफल्स की वीर परंपरा से निकला यह सैनिक आज एक महत्वपूर्ण संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने जा रहा है। उनका सफर यह संदेश देता है कि अनुशासन, कड़ी मेहनत और देशसेवा की भावना किसी भी व्यक्ति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। उत्तराखंड की धरती के लिए भी यह गर्व का क्षण है, क्योंकि पहाड़ की मिट्टी से जुड़ी वीरता और मूल्यों ने एक ऐसे नेता को जन्म दिया है, जिसने सेना से लेकर राजभवन तक अपनी अलग पहचान बनाई।

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Hill Mail

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