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पशुपालन में यंत्रीकरण बढ़ाने पर पंतनगर विश्वविद्यालय में मंथन

गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के प्रौद्योगिकी महाविद्यालय में आईसीएआर की अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत ‘पशुपालन में यंत्रीकरण’ विषय पर 7 से 8 मार्च 2026 तक दो दिवसीय 25वीं वार्षिक कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यशाला में देश के विभिन्न कृषि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों तथा आईसीएआर से जुड़े वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. एस. एन. झा, उप महानिदेशक (कृषि अभियांत्रिकी), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली रहे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनमोहन सिंह चौहान ने की। इस अवसर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहायक महानिदेशक (फार्म इंजीनियरिंग) डॉ. के.पी. सिंह, सहायक महानिदेशक (पशु स्वास्थ्य) डॉ. दीवाकर हिमाद्री, निदेशक, केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल डॉ. सी.आर. मेहता तथा परियोजना समन्वयक, आईसीएआर–केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल डॉ. एस.पी. सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

मुख्य अतिथि डॉ. एस.एन. झा ने अपने संबोधन में कहा कि भारत में पशुपालन किसानों की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है और इस क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों तथा यंत्रीकरण के उपयोग से उत्पादकता को और अधिक बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने पशु प्रबंधन में पर्यावरण प्रबंधन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उचित प्रबंधन से पशुओं की उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। उदाहरण स्वरूप उन्होंने बताया कि दुग्ध देने वाले पशुओं को रखने के स्थान का तापमान यदि 2 से 3 डिग्री सेल्सियस कम कर दिया जाए तो दुग्ध उत्पादन में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है।

उन्होंने आवारा पशुओं के कल्याण के विषय में भी विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया तथा जहां भारी वजन की ढुलाई होती है वहां रोबोटिक पशुओं के विकास की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने नवीन विकसित तकनीकों के डिज़ाइन पंजीकरण के स्थान पर पेटेंट दाखिल करने का सुझाव दिया तथा वैज्ञानिकों से अधिक संख्या में गुणवत्तापूर्ण शोध पत्र प्रकाशित करने का आग्रह किया। उन्होंने परियोजना समन्वयक को प्रत्येक वर्ष विभिन्न केंद्रों पर कार्यरत वैज्ञानिकों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित करने तथा यंत्रीकरण परियोजना के 40 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर एक पुस्तक प्रकाशित करने का सुझाव भी दिया।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनमोहन सिंह चौहान ने कहा कि गोविन्द बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कृषि अनुसंधान और तकनीकी विकास के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि पशुपालन के क्षेत्र में यंत्रीकरण किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध हो सकता है, जिससे न केवल उत्पादन में वृद्धि होगी बल्कि श्रम दक्षता भी बढ़ेगी। उन्होंने वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उपयोगी और व्यावहारिक तकनीकों का विकास करें।

उन्होंने कहा कि छोटी जोत वाले किसानों के लिए भी कम लागत वाले उपयोगी यंत्रों का विकास किया जाना चाहिए। साथ ही बद्रीनाथ और केदारनाथ में खच्चरों का बड़े पैमाने पर उपयोग होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने उनके ऊपर रखे जाने वाले भार को कम करने के लिए यंत्रीकरण की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि विकसित भारत 2047 की संकल्पना को साकार करने के लिए यंत्रीकरण अत्यंत आवश्यक होगा और पशुपालन क्षेत्र में यंत्रीकरण के प्रयास सराहनीय हैं। उन्होंने पशुओं के उपयोग में नैतिक मूल्यों के महत्व पर भी प्रकाश डाला तथा यंत्रीकरण के माध्यम से दुधारू पशुओं से कम समय में और कम कष्ट के साथ अधिक दुग्ध प्राप्त करने की संभावनाओं पर चर्चा की।

इसी क्रम में डॉ. के.पी. सिंह ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पशुपालन के क्षेत्र में यंत्रीकरण से उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय में भी वृद्धि की जा सकती है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने के लिए विस्तार तंत्र को और अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न विषयों में एकीकृत शोध अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है।

कार्यक्रम में डॉ. सी.आर. मेहता ने अपने संबोधन में कहा कि पशुपालन क्षेत्र में यंत्रीकरण की आवश्यकता दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उन्होंने कहा कि श्रम की कमी और बढ़ती लागत को देखते हुए आधुनिक यंत्रों और तकनीकों का उपयोग अनिवार्य हो गया है। उन्होंने वैज्ञानिकों से ऐसी तकनीकों के विकास का आग्रह किया जो किसानों के लिए किफायती, उपयोग में सरल तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल हों। उन्होंने देश के सभी नौ केंद्रों द्वारा स्टेटस पेपर तैयार करने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को यंत्रीकरण में बढ़ावा देने तथा गुणवत्तापूर्ण शोध प्रकाशन पर बल दिया और परियोजना समन्वयक को विभिन्न केंद्रों का स्वॉट (SWOT) विश्लेषण करने का सुझाव भी दिया।

इस अवसर पर परियोजना समन्वयक डॉ. एस.पी. सिंह ने देश के नौ केंद्रों पर चल रहे कार्यों की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि पशुपालन के विभिन्न कार्यों जैसे दुग्ध उत्पादन, चारा प्रबंधन, गोबर प्रबंधन तथा पशु देखभाल में आधुनिक यंत्रों और तकनीकों के उपयोग से कार्यों को अधिक सरल और प्रभावी बनाया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि परियोजना के अंतर्गत विभिन्न केंद्रों पर कई नवीन तकनीकों का विकास किया गया है, जो किसानों के लिए उपयोगी सिद्ध हो रही हैं।

इस अवसर पर सर्वश्रेष्ठ केंद्र पुरस्कार से आईसीएआर–केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल को सम्मानित किया गया। विभिन्न केंद्रों द्वारा तैयार किए गए कुल छह प्रकाशनों का अतिथियों द्वारा अनावरण किया गया। साथ ही पंतनगर कृषि विश्वविद्यालय द्वारा मैसर्स रामकिशन एग्री इनोवेटिव प्राइवेट लिमिटेड के साथ तीन एमओयू — ‘बैटरी ऑपरेटेड डंग कलेक्शन मशीन’, ‘एनिमल ड्रॉन सीड-कम-सब-सरफेस मैन्योर एप्लिकेटर’ तथा ‘बैटरी असिस्टेड पोल्ट्री लिटर रेकिंग मशीन’ पर हस्ताक्षर किए गए।

कार्यक्रम के प्रारंभ में निदेशक शोध डॉ. एस.के. वर्मा ने सभी अतिथियों, वैज्ञानिकों एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि पशुपालन क्षेत्र में यंत्रीकरण से कार्यों की दक्षता बढ़ती है तथा किसानों को श्रम और समय दोनों की बचत होती है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की कार्यशालाएं वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों को अपने शोध अनुभव साझा करने का महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती हैं।

कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन परियोजना अन्वेषक डॉ. जयंत सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के सभी महाविद्यालयों के अधिष्ठाता, निदेशकगण, संकाय सदस्य तथा प्रगतिशील कृषक उपस्थित रहे।

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Hill Mail

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