दिल्ली से गौरीकोट तक: सविता रावत की रिवर्स पलायन की साहसिक यात्रा

दिल्ली से गौरीकोट तक: सविता रावत की रिवर्स पलायन की साहसिक यात्रा

उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों से पलायन वर्षों से एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक चुनौती बना हुआ है, वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस प्रवृत्ति को उलटकर नई राह बना रहे हैं। पौड़ी गढ़वाल जिले के छोटे से गांव गौरीकोट की रहने वाली सविता रावत ऐसी ही एक सशक्त महिला हैं, जिन्होंने ‘रिवर्स पलायन’ को केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक सफल और टिकाऊ मॉडल बनाकर दिखाया है।

शहर की सुरक्षित नौकरी से गांव की अनिश्चित राह तक

सविता रावत ने अपने जीवन के लगभग 12 वर्ष दिल्ली में बिताए। एक स्थिर नौकरी, नियमित आय और शहरी सुविधाएं सब कुछ था। लेकिन मन कहीं और था। गांव, पहाड़, अपनी मिट्टी और आत्मनिर्भर जीवन की चाह उन्हें लगातार आवाज़ देती रही। आख़िरकार वर्ष 2018 में उन्होंने एक साहसिक निर्णय लिया, दिल्ली की नौकरी छोड़कर गांव लौटने का। यह फैसला आसान नहीं था। परिवार, समाज और आर्थिक जोखिम, हर स्तर पर चुनौतियां थीं। लेकिन सविता का विश्वास अपने सपने से बड़ा था।

शुरुआती संघर्ष और सीख

गांव लौटने के बाद उन्होंने सबसे पहले सब्ज़ियों की खेती शुरू की। मेहनत खूब की, लेकिन अपेक्षित लाभ नहीं मिला। मौसम, बाजार और परिवहन जैसी समस्याओं ने उन्हें सिखाया कि पहाड़ में खेती केवल परंपरा से नहीं, बल्कि सही फसल चयन और वैज्ञानिक सोच से सफल होती है। यहीं से सविता के जीवन में निर्णायक मोड़ आया।

सेब और कीवी: एक दूरदर्शी फैसला

सब्ज़ी खेती के अनुभव के बाद सविता ने सेब और कीवी की बागवानी की ओर कदम बढ़ाया। यह एक लंबी अवधि का निवेश था, जिसमें धैर्य, पूंजी और तकनीकी ज्ञान—तीनों की ज़रूरत थी।

उन्होंने उत्तराखंड एप्पल मिशन से जुड़कर आधुनिक किस्मों की खेती शुरू की, जिनमें शामिल हैं गाला (Gala), रेड डेलिशियस, स्निको रेड, किंग रोट। आज उनके बगीचों में 2000 से अधिक सेब के पेड़, 100 से ज्यादा कीवी के पौधे स्वस्थ रूप से फल-फूल रहे हैं।

निवेश, धैर्य और सफलता

अब तक सविता रावत करीब 60–70 लाख रुपये का निवेश कर चुकी हैं। यह निवेश केवल पैसों का नहीं, बल्कि समय, मेहनत और विश्वास का भी है।
पिछले तीन वर्षों से उन्हें सेब की खेती से नियमित आमदनी हो रही है।

2023 में सेब की फसल से उन्हें लगभग 1.5 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ। 2024 में मौसम की मार से नुकसान हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। 2025 को लेकर वे आशावादी हैं और बेहतर उत्पादन की पूरी उम्मीद है।

गांव में रोजगार और सामाजिक बदलाव

सविता की खेती केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं है। उनके प्रयासों से गांव में स्थायी रूप से 1–2 लोगों को रोजगार, सीजन के दौरान 4–5 स्थानीय लोगों को काम मिलता है। इससे गांव के अन्य लोग भी बागवानी और रिवर्स पलायन को लेकर प्रेरित हो रहे हैं।

खेती से आगे: होमस्टे और पर्यटन

सविता रावत ने खेती के साथ-साथ गांव में होमस्टे की भी शुरुआत की है। उनका उद्देश्य केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि पहाड़ की संस्कृति को जीवित रखना है। यहां पर्यटकों को मिलेगा, पहाड़ी जीवनशैली का वास्तविक अनुभव, पारंपरिक गढ़वाली भोजन, शांत प्राकृतिक वातावरण, भविष्य में योग और वेलनेस रिट्रीट की योजना, यह पहल गांव को पर्यटन मानचित्र पर लाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

पहाड़ केवल संघर्ष नहीं, संभावनाओं की धरती

सविता रावत की कहानी यह साबित करती है कि पहाड़ों में रहकर भी सम्मानजनक, आत्मनिर्भर और स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है। आधुनिक सोच, सही जानकारी और परंपरागत ज्ञान के मेल से गांवों में नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

युवाओं के लिए एक संदेश

सविता की यात्रा पहाड़ के युवाओं को यह संदेश देती है कि गांव छोड़ना ही सफलता का रास्ता नहीं, खेती घाटे का सौदा नहीं, अगर उसे व्यवसाय की तरह किया जाए, रिवर्स पलायन गांवों को मजबूत बनाने का व्यावहारिक समाधान है।

आज सविता रावत न केवल एक सफल किसान और उद्यमी हैं, बल्कि पहाड़ की बेटियों और युवाओं के लिए आत्मविश्वास, स्वाभिमान और उम्मीद की प्रतीक बन चुकी हैं।

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