पलायन से संघर्ष तक: स्वरोजगार की नई राह से बदल रही पौड़ी की तस्वीर

पलायन से संघर्ष तक: स्वरोजगार की नई राह से बदल रही पौड़ी की तस्वीर

कभी पलायन और बेरोजगारी की मार झेलने वाला पौड़ी जिला अब स्वरोजगार के जरिए अपनी नई पहचान गढ़ने की कोशिश कर रहा है। महिलाएं फूलों की खेती कर रही हैं, युवा मशरूम, मधुमक्खी पालन, डेयरी और मत्स्य पालन जैसे व्यवसायों से जुड़ रहे हैं, जबकि रेशम उत्पादन का यमकेश्वर मॉडल अब पूरे जिले के लिए उम्मीद की नई किरण बनता दिख रहा है। सरकारी योजनाओं और स्थानीय लोगों की मेहनत ने पहाड़ में रोजगार के नए अवसर पैदा किए हैं, हालांकि अब भी योजनाओं को अधिक सरल और प्रभावी बनाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

ग्राम्य विकास एवं पलायन निवारण आयोग की रिपोर्ट-2025 के अनुसार स्वरोजगार और अन्य माध्यमों से आय अर्जित करने वालों की संख्या के आधार पर पौड़ी जिला प्रदेश में आठवें स्थान पर है। जिले में करीब 7.82 प्रतिशत लोग स्वरोजगार से अपनी आय अर्जित कर रहे हैं। हालांकि अब भी बड़ी संख्या में लोग मनरेगा पर निर्भर हैं, लेकिन धीरे-धीरे पहाड़ में स्वरोजगार की दिशा में सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगा है।

 

पर्यटन क्षेत्र में भी स्वरोजगार को बढ़ावा मिला है। दीन दयाल गृह आवास होम स्टे विकास योजना के तहत कई लोगों ने अपने घरों को रोजगार का माध्यम बनाया। वहीं वीर चंद्र गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना के तहत लाभ लेने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2024-25 में जहां 250 लोगों ने योजना का लाभ लिया, वहीं 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 265 पहुंच गई। इससे स्थानीय युवाओं को पर्यटन आधारित रोजगार के अवसर मिले हैं।

 

रेशम उत्पादन के क्षेत्र में यमकेश्वर ब्लॉक का मॉडल अब पूरे राज्य के लिए उदाहरण बनता जा रहा है। रेशम विभाग ने कस्याली और नेल बडोली क्षेत्र में करीब 300 एकड़ भूमि पर स्वयं सहायता समूहों के साथ मिलकर रेशम उत्पादन की शुरुआत की। लैंटाना से घिरे क्षेत्रों को साफ कर वहां शहतूत के पौधे लगाए गए। इस कार्य से करीब 300 लोग जुड़े हैं और पिछले वित्तीय वर्ष में 2100 किलोग्राम कोकून उत्पादन से लगभग 14 लाख रुपये की आय हुई। खास बात यह है कि इस काम में बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़ी हैं। अब विभाग इस मॉडल को जिले के अन्य हिस्सों में भी लागू करने की योजना बना रहा है।

 

रेशम विभाग के निदेशक प्रदीप कुमार के अनुसार इस वर्ष 12 से 15 हजार किलोग्राम उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है, जिससे करीब 90 लाख रुपये तक की आय होने की उम्मीद है। विभाग केवल कोकून उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य में रेशम के धागे और कपड़ा निर्माण तक की योजना पर भी काम कर रहा है।

 

महिलाएं भी स्वरोजगार के क्षेत्र में मिसाल बन रही हैं। कोट गांव की पूजा ने दो पॉलीहाउस से फूलों की खेती शुरू की थी। अब इससे सालाना चार से पांच लाख रुपये तक की आय हो रही है और अन्य महिलाएं भी इस काम से जुड़ रही हैं। वहीं मलेठी गांव की बिनीता ने डेयरी व्यवसाय शुरू कर दूध, दही, मट्ठा और पनीर तैयार कर बाजार तक पहुंचाना शुरू किया है। उनका कहना है कि यदि सरकारी योजनाओं की जानकारी गांव-गांव तक पहुंचे तो और अधिक लोग इससे लाभ उठा सकते हैं।

 

इसी तरह डूंगरी गांव के ध्रुव सिंह रावत सब्जी उत्पादन और डेयरी के जरिए रोजगार से जुड़े हैं, जबकि भिमली गांव के महेंद्र सिंह इंटीग्रेटेड खेती के तहत मधुमक्खी पालन, मशरूम और मत्स्य पालन जैसे कार्य कर रहे हैं। उनका कहना है कि स्वरोजगार के क्षेत्र में पहाड़ में अपार संभावनाएं हैं और थोड़ी सरकारी मदद से लोग आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

 

वन विभाग भी लीसा उत्पादन और वन उपज के जरिए स्थानीय लोगों की आय बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। कंडोलिया और कमेड़ा जैसे क्षेत्रों में सैंपल प्लांट तैयार किए गए हैं और लोगों को प्रशिक्षण देने की योजना बनाई गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजनाओं का सही क्रियान्वयन हो और लोगों तक उनकी पहुंच बढ़े तो पौड़ी जिला स्वरोजगार के क्षेत्र में प्रदेश के अग्रणी जिलों में शामिल हो सकता है।

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