उत्तराखंड में लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर लंबे समय से जारी देरी पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए पूछा है कि आखिर अब तक सर्च कमेटी की बैठक क्यों नहीं बुलाई गई और पूर्व में दिए गए आदेशों का पालन क्यों नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने सरकार को 24 घंटे के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय में जवाब नहीं दिया गया तो संबंधित सचिव को 15 मई को सुबह 11 बजे व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ेगा।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सरकार के रवैये पर गंभीर सवाल उठाए। यह सुनवाई हल्द्वानी निवासी रवि शंकर जोशी द्वारा दायर जनहित याचिका पर की गई, जिसमें राज्य में लंबे समय से रिक्त पड़े लोकायुक्त पद पर शीघ्र नियुक्ति की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति न होने से भ्रष्टाचार के मामलों की निष्पक्ष जांच प्रभावित हो रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में राज्य की सभी जांच एजेंसियां सरकार के अधीन कार्य कर रही हैं और उनका नियंत्रण राजनीतिक नेतृत्व के हाथों में है। ऐसे में कोई भी एजेंसी बिना सरकारी अनुमति के राजपत्रित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर सकती। यहां तक कि सतर्कता विभाग भी पूरी तरह पुलिस तंत्र के अधीन है, जिससे उसकी स्वतंत्रता पर सवाल खड़े होते हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि एक स्वतंत्र और निष्पक्ष लोकायुक्त व्यवस्था लोकतंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए बेहद जरूरी है। लोकायुक्त के अभाव में भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष जांच संभव नहीं हो पा रही है। याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि लोकायुक्त की नियुक्ति में लगातार हो रही देरी के कारण हर साल दो से तीन करोड़ रुपये अनावश्यक रूप से खर्च हो रहे हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि देश के कई राज्यों में लोकायुक्त संस्थाएं प्रभावी रूप से कार्य कर रही हैं। कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में लोकायुक्त ने कई बड़े भ्रष्टाचार मामलों में कार्रवाई कर सरकारों को जवाबदेह बनाया है, जबकि उत्तराखंड में छोटे-छोटे मामलों के लिए भी लोगों को उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है।
उधर, हाईकोर्ट ने प्रदेश में बढ़ते अतिक्रमण के मामलों को लेकर भी सरकार को आड़े हाथों लिया। रुद्रपुर में हुए अतिक्रमण के मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने पूछा कि अतिक्रमण की शिकायतों के लिए बनाया गया सरकारी एप वास्तव में काम भी कर रहा है या नहीं। कोर्ट ने राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर इस संबंध में विस्तृत जवाब देने को कहा है।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकार द्वारा बनाए गए शिकायत एप केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं। आम लोगों की शिकायतों पर न तो समय पर कार्रवाई हो रही है और न ही उन्हें कोई समाधान मिल रहा है। अदालत को यह भी बताया गया कि पूर्व में हाईकोर्ट ने सभी जिलों में प्रभावी शिकायत तंत्र विकसित करने के निर्देश दिए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
हाईकोर्ट की सख्ती ने एक बार फिर सरकार की जवाबदेही और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम और अदालत में पेश किए जाने वाले जवाब पर टिकी हुई है।







