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उत्तराखंड न्यूज़चमोलीरुद्रप्रयागसरोकार

दिसंबर नहीं, अब अप्रैल में सफेद हो रहा हिमालय: बदलती बर्फबारी ने बढ़ाया ग्लेशियर संकट

संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. पंकज चौहान और उनकी टीम द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि उत्तराखंड के पिंडारी और कफनी ग्लेशियर क्षेत्रों में इस वर्ष जनवरी-फरवरी की तुलना में मार्च-अप्रैल में ज्यादा बर्फबारी हुई। अप्रैल महीने में यहां 158 सेंटीमीटर तक बर्फ दर्ज की गई, जबकि मार्च में 84 सेंटीमीटर और जनवरी में केवल 96 सेंटीमीटर बर्फबारी हुई। दिसंबर में तो हालात इतने कमजोर रहे कि केवल चार बार हल्की बर्फबारी रिकॉर्ड हुई, वह भी ऊंचे इलाकों तक सीमित रही।

वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह पश्चिमी विक्षोभ के व्यवहार में आई असमानता है। पहले सर्दियों में सक्रिय रहने वाले पश्चिमी विक्षोभ अब कमजोर पड़ रहे हैं, जबकि गर्मियों के करीब आते महीनों में उनकी सक्रियता बढ़ रही है। इसका नतीजा यह है कि मार्च और अप्रैल जैसे अपेक्षाकृत गर्म महीनों में बर्फबारी हो रही है। लेकिन तापमान अधिक होने के कारण यह बर्फ तेजी से पिघल भी रही है, जिससे ग्लेशियरों को स्थायी नुकसान पहुंच रहा है।

डॉ. पंकज चौहान के मुताबिक, ग्लेशियर हिमालय के “वॉटर बैंक” हैं। ये नदियों और जलधाराओं को लगातार पानी उपलब्ध कराते हैं। यदि बर्फबारी का यह असंतुलित पैटर्न जारी रहा तो भविष्य में जलसंकट गहरा सकता है। गर्मियों में तेजी से पिघलती बर्फ से अचानक जलप्रवाह बढ़ेगा, जिससे भूस्खलन, बाढ़ और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट जैसी आपदाओं का खतरा भी बढ़ सकता है।

शोध में यह भी सामने आया कि बर्फबारी में कमी और तापमान में वृद्धि के कारण हिमालय की ट्री लाइन लगातार ऊपर की ओर खिसक रही है। कुछ क्षेत्रों में तापमान सामान्य से 0.1 से लेकर 5 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया। इसका असर हिमालय की जैव विविधता पर भी पड़ रहा है। कई वनस्पतियां और जीव-जंतु अपने प्राकृतिक आवास खोने की स्थिति में पहुंच रहे हैं।

पर्यावरणविद् पद्मविभूषण डॉ. अनिल जोशी का कहना है कि हिमालय में मौसम के इस बदलाव का असर केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रहेगा। इससे खेती, खाद्य सुरक्षा, पर्यटन और हॉर्टिकल्चर पर भी गहरा प्रभाव पड़ेगा। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो अनाज उत्पादन प्रभावित होगा और खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। पर्वतीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था भी संकट में पड़ सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालय में हो रहे इन बदलावों को केवल स्थानीय समस्या मानना भूल होगी। हिमालय करोड़ों लोगों के जलस्रोतों का आधार है। यहां के ग्लेशियर एशिया की प्रमुख नदियों को जीवन देते हैं। ऐसे में बर्फबारी के बदलते पैटर्न को जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी मानते हुए तत्काल वैज्ञानिक और पर्यावरणीय स्तर पर ठोस रणनीति बनाने की जरूरत है।

हिमालय की बदलती यह तस्वीर साफ संकेत दे रही है कि प्रकृति अब संतुलन बिगड़ने की चेतावनी खुलकर दे रही है।

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Hill Mail

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