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ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II: जब अजीत डोभाल ने ‘रिक्शावाले’ बनकर आतंकियों के बीच बिताए दो दिन

भारत की खुफिया दुनिया में कुछ ऑपरेशन ऐसे हैं, जो समय के साथ किंवदंती बन जाते हैं। साल 1988 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में चलाया गया ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II’ भी ऐसा ही मिशन था। इस ऑपरेशन ने न केवल पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ भारत की रणनीति को नई दिशा दी, बल्कि एक ऐसे जांबाज अधिकारी को देश के सामने लाया, जिसका नाम आगे चलकर राष्ट्रीय सुरक्षा का पर्याय बन गया।

उस समय पंजाब आतंकवाद की आग में झुलस रहा था। खालिस्तानी उग्रवादियों ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर परिसर को अपना गढ़ बना लिया था। भारी हथियारों से लैस आतंकवादी मंदिर के भीतर छिपे हुए थे और सुरक्षा एजेंसियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि अंदर की सही स्थिति का पता कैसे लगाया जाए। किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई में धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचने का खतरा था, इसलिए सरकार बेहद सतर्क थी।

ऐसे कठिन समय में खुफिया ब्यूरो के अधिकारी अजीत डोभाल ने वह जिम्मेदारी उठाई, जिसे निभाना मौत के मुंह में जाने जैसा था। उन्होंने एक साधारण रिक्शावाले का भेष धारण किया और स्वर्ण मंदिर के आसपास घूमना शुरू किया। उनके कपड़े, हावभाव और बोलचाल इतनी सामान्य थी कि किसी को उन पर शक तक नहीं हुआ। धीरे-धीरे उन्होंने मंदिर के भीतर मौजूद उग्रवादियों के संपर्क सूत्र तलाश लिए।

डोभाल ने अपनी तेज बुद्धि और अद्भुत मनोवैज्ञानिक क्षमता का इस्तेमाल करते हुए आतंकवादियों को विश्वास दिलाया कि वे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI की ओर से भेजे गए व्यक्ति हैं। उन्होंने खुद को ऐसा एजेंट बताया, जो उग्रवादियों की मदद करने और पाकिस्तान से हथियारों की सप्लाई सुनिश्चित करने आया है। आतंकियों ने उनकी बातों पर भरोसा कर लिया और उन्हें अपने बीच आने-जाने की अनुमति दे दी।

यहीं से शुरू हुआ भारतीय खुफिया इतिहास का सबसे साहसी अध्याय। अजीत डोभाल करीब दो दिनों तक आतंकियों के बीच रहे। इस दौरान उन्होंने बेहद महत्वपूर्ण जानकारियां जुटाईं। उन्होंने पता लगाया कि मंदिर परिसर में कितने आतंकवादी मौजूद हैं, उनके पास कौन-कौन से हथियार हैं, गोला-बारूद कितना है और उन्होंने किन-किन स्थानों पर मोर्चाबंदी कर रखी है। इतना ही नहीं, उन्होंने आतंकवादियों की मानसिक स्थिति और उनकी रणनीति का भी गहराई से अध्ययन किया।

इन जानकारियों को बाहर पहुंचाना भी किसी जोखिम से कम नहीं था। यदि आतंकियों को जरा भी शक हो जाता, तो डोभाल की जान बचना लगभग असंभव था। लेकिन उन्होंने धैर्य और सूझबूझ के साथ हर कदम उठाया और सुरक्षा एजेंसियों तक सटीक खुफिया जानकारी पहुंचाई।

जब भारतीय सुरक्षा बलों और NSG कमांडोज ने अंतिम कार्रवाई शुरू की, तब उनके पास डोभाल द्वारा जुटाई गई ‘लाइव इंटेलिजेंस’ मौजूद थी। यही इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी ताकत बनी। सुरक्षा बलों ने बेहद योजनाबद्ध तरीके से मंदिर परिसर को चारों ओर से घेर लिया। इस बार रणनीति पहले से अलग थी, उद्देश्य केवल आतंकियों को खत्म करना नहीं, बल्कि धार्मिक स्थल को किसी भी नुकसान से बचाना भी था।

कमांडोज की सटीक तैयारी और मजबूत घेराबंदी देखकर आतंकवादियों का मनोबल टूटने लगा। उन्हें एहसास हो गया कि सुरक्षा बलों को उनकी हर स्थिति की जानकारी है। परिणामस्वरूप, कई आतंकियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि इस पूरे ऑपरेशन में हरमंदिर साहिब को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा और बड़े पैमाने पर खून-खराबा भी नहीं हुआ।

‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II’ को भारत के सबसे सफल आतंकवाद-रोधी अभियानों में गिना जाता है। इस मिशन ने यह साबित कर दिया कि केवल ताकत ही नहीं, बल्कि सटीक खुफिया जानकारी और रणनीतिक धैर्य भी किसी बड़े संकट को टाल सकता है।

इस असाधारण साहस और राष्ट्रसेवा के लिए अजीत डोभाल को साल 1988 में ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया गया। वे भारत के इतिहास में इस सम्मान को पाने वाले पहले पुलिस अधिकारी बने। बाद में उन्होंने देश की सुरक्षा व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं और आज भी उन्हें भारत के सबसे प्रभावशाली रणनीतिकारों में गिना जाता है।

‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर-II’ केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह भारतीय खुफिया एजेंसियों की सूझबूझ, धैर्य और अदम्य साहस की मिसाल थी। और इस मिशन के केंद्र में थे अजीत डोभाल  वह अधिकारी, जिसने दुश्मनों के बीच रहकर देश की जीत की पटकथा लिखी।

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Hill Mail

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