– जयसिंह रावत
प्रधानमंत्री का ध्यान सबसे अधिक केदारनाथ पर है। उन्होंने 21 अक्टूबर को अपनी यात्रा की शुरूआत जिस केदारनाथ से की उसमें 22 सितम्बर से लेकर 2 अक्टूबर तक 3 बड़े एवलांच आने के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन कर खतरे की आशंकाओं की जांच करायी तो केदारनाथ मंदिर एवलांच से तो सुरक्षित पाया गया मगर समिति ने भारी निर्माण कार्यों के प्रति जिस तरह आगाह किया वह अपने आप में खतरे का अलार्म बजाने के समान ही है। इस सरकारी समिति ने केदारनाथ में भारी निर्माण कार्यों से सरकार को सचेत किया है।
जबकि वहां सुरक्षा और सुन्दरता के नाम पर जितने भारी भरकम निर्माण कार्य होने थे वे पहले ही हो चुके हैं और अब सौंदर्यीकरण और आवासीय उदे्श्य के निर्माण कार्य चल रहे हैं। इस कमेटी में आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केन्द्र के डॉ पियूष रौतेला, वाडिया भूगर्व संस्थान के मनीष मेहता और विनीत कुमार तथा रिमोट संेंिसंग के सी.एम. भट्ट और प्रतिमा पाण्डे शामिल थे। ये सरकारी कमेटी ज्यादा से ज्यादा अपने विचार इसी सीमा तक प्रकट कर सकती थी। सवाल केवल मंदिर का नहीं पूरे केदार धाम का सुरक्षित रहना जरूरी है और केदारनाथ मंदिर के अलावा पूरे धाम क्षेत्र को सुरक्षित मानना जल्दबाजी ही होगी। मंदिर तो 2013 की महाआपदा में भी सुरक्षित रहा मगर हजारों श्रद्धालु और पंडे पुजारी कहां सुरक्षित रहे? उसी धाम में भैरों मंदिर क्षेत्र एवलांच के लिये संवेदनशील है।

नवीनतम् कमेटी से पहले उत्तराखण्ड अंतरिक्ष केन्द्र के भूविज्ञानी प्रो. महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट और उससे भी पहले वाडिया भूगर्व संस्थान की टीम केदारनाथ क्षेत्र का अध्ययन कर चुकी है। सभी ने केदारनाथ में भारी निर्माण के प्रति सचेत किया था। वाडिया की टीम ने तो रामबाड़ा से ऊपर कोई निर्माण न करने की सलाह दी थी। केदारनाथ को भारतीय भूगर्व सर्वेक्षण विभाग की डा. श्रीवास्तव की टीम ने भी भारी निर्माण के प्रति आगाह किया था, क्योंकि केदारनाथ ग्लेशियल फिल्ड सेडिमेंट या मोरेन के काफी ऊंचे मलबे में बसा हुआ है।
प्रख्यात पर्यावरणविद एवं चिपको आन्दोलन के प्रणेता पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट का भी कहना है कि किसी भी स्थान की सुन्दरता तो अच्छी लगती ही है। सरकार चाराधामों को सुन्दर और आकर्षक बना रही है तो अच्छा ही है, लेकिन सुन्दरता से अधिक महत्वपूर्ण इन पवित्र स्थलों की सुरक्षा और स्थिरता है। अगर ये तीर्थस्थल ही नहीं रहेंगे तो सुन्दरता कहां रहेगी? चिपको नेता कहते हैं कि मौजूदा हालात में चारों ही धाम किसी न किसी कारण से सुरक्षित नहीं हैं। चण्डी प्रसाद भट्ट का कहना है कि बदरीनाथ हो या फिर चारों हिमालयी धामों में से कहीं भी क्षेत्र विशेष की धारक क्षमता (कैरीयिंग कैपेसिटी) से अधिक मानवीय भार नहीं पड़ना चाहिये। अन्यथा हमें केदारनाथ और मालपा जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ेगा।

माना कि एवलांच से केदारनाथ को फिलहाल कोई खतरा नहीं, मगर बदरीनाथ में मंदिर के अलावा पूरा धाम एवलांच की जद में रहता है। केदारनाथ की तरह ही विशेषज्ञों की राय के बिना बदरीनाथ का मास्टर प्लान बना दिया। जबकि 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद इन हिमालयी तीर्थों में प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ न किये जाने की अपेक्षा की जा रही थी। इससे पहले 1974 में बिड़ला ग्रुप के जयश्री ट्रस्ट द्वारा बदरीनाथ के जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया था। लेकिन चिपको नेता चण्डी प्रसाद भट्ट एवं गौरा देवी तथा जोशीमठ के ब्लाक प्रमुख गोविन्द सिंह रावत आदि के नेतृत्व में चले स्थानीय लोगों के आन्दोलन के कारण उत्तर प्रदेश की तत्कालीन हेमवती नन्दन बहुगुणा सरकार ने निर्माण कार्य रुकवा दिया था। इतिहास बताता है कि बदरीनाथ एवलांच, भूस्खलन और भूकम्प के खतरों की जद में है और वहां लगभग हर 4 या 5 साल बाद हिमखण्ड गिरने से भारी नुकसान होता रहता है। बद्रीनाथ मंदिर को हिमखण्ड स्खलन (एवलांच) से बचाने के लिये सिंचाई विभाग ने नब्बे के दशक में एवलांचरोधी सुरक्षा उपाय तो कर दिये मगर वे उपाय कितने कारगर हैं, उसकी अभी परीक्षा नहीं हुयी है। ऐसी स्थिति में इस उच्च हिमालयी क्षेत्र में भारी छेड़-छाड़ जोखिमपूर्ण हो सकती है।
उत्तराखण्ड अंतरिक्ष उपयोग केन्द्र (यूसैक) के निदेशक प्रो महेन्द्र प्रताप कहते हैं कि बदरीनाथ मंदिर की स्थिति आंख और भौं की जैसी है और नारायण पर्वत की शेषनाग पहाड़ी भौं की भूमिका में आंख जैसे मंदिर की रक्षा करती है। नर और नारायण पर्वतों के बीच नारायण पर्वत की गोद में शेषनाग पहाड़ी की ओट में ऐसी जगह चुनी गयी जहां एयर बोर्न एवलांच सीधे मंदिर के ऊपर से निकल जाते हैं और बाकी एवलांच अगल-बगल से सीधे अलकनन्दा में गिर जाते। इसलिये मंदिर तो काफी हद तक सुरक्षित माना जाता है।
जानकारों का मानना है कि बदरी धाम केवल मंदिर तक सीमित न होकर 3 वर्ग किमी तक फैला हुआ है। जिसके 85 हैक्टेअर के लिये मास्टर प्लान बना है। इसका ज्यादातर हिस्सा एवलांच और भूस्ख्सलन की दृष्टि से अति संवेदनशील है। वास्तव में जब तक वहां के चप्पे-चप्पे का भौगोलिक और भूगर्वीय अध्ययन नहीं किया जाता तब तक किसी भी तरह के मास्टर प्लान का कोई औचित्य नहीं है। मास्टर प्लान पर टिप्पणी किये बिना भूविज्ञानी प्रो महेन्द्र प्रताप बिष्ट का कहना है कि बदरीनाथ में कम से कम तीन शीत ऋतुओं के आधार पर अध्ययन किया जाना चाहिये ताकि वहां की जलवायु संबंधी परिस्थितियों का डाटा जुटाया जा सके। बदरीनाथ के तप्तकुण्डों के गर्म पानी के तापमान और वॉल्यूम का भी डाटा तैयार किये जाने की जरूरत है। क्योंकि अनावश्यक छेड़छाड़ से पानी के श्रोत सूख जाने का खतरा बना रहता है।

भागीरथी के उद्गम क्षेत्र में स्थित गंगोत्री मंदिर पर भी भैंरोझाप नाला खतरा बना हुआ है। इस मंदिर का निर्माण उत्तराखण्ड पर हमला करने वाले नेपाली जनरल अमर सिंह थापा ने 19वीं सदी में किया था। हिन्दुओं की मान्यता है कि भगीरथ ने अपने पुरखों के उद्धार हेतु गंगा के पृथ्वी पर उतारने के लिये इसी स्थान पर तपस्या की थी। इसरो द्वारा देश के चोटी के वैज्ञानिक संस्थानों की मदद से तैयार किये गये लैण्ड स्लाइड जोनेशन मैप के अनुसार गंगोत्री क्षेत्र में 97 वर्ग कि.मी. इलाका भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है जिसमें से 14 वर्ग कि.मी. का इलाका अति संवेदनशील है। गोमुख का भी 68 वर्ग कि.मी. क्षेत्र संवेदनशील बताया गया है। भूगर्व सर्वेक्षण विभाग के वैज्ञानिक पी.वी.एस. रावत ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में गंगोत्री मंदिर के पूर्व की ओर स्थित भैरांेझाप नाले को मंदिर के अस्तित्व के लिये खतरा बताया था और चेताया था कि अगर इस नाले का शीघ्र इलाज नहीं किया गया तो ऊपर से गिरने वाले बडे़ बोल्डर कभी भी गंगोत्री मंदिर को धराशयी करने के साथ ही भारी जनहानि कर सकते हैं।
यमुनोत्री मंदिर के सिरहाने खड़े कालिंदी पर्वत से वर्ष 2004 में हुए भूस्खलन से मंदिर परिसर के कई निर्माण क्षतिग्रस्त हुए तथा छह लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2007 में यमुनोत्री से आगे सप्तऋषि कुंड की ओर यमुना पर झील बनने से तबाही का खतरा मंडराया जो किसी तरह टल गया। वर्ष 2010 से तो हर साल यमुना में उफान आने से मंदिर के निचले हिस्से में कटाव शुरू हो गया है। इस हादसे के मात्र एक महीने के अन्दर ही कालिन्दी फिर दरक गया और उसके मलवे ने यमुना का प्रवाह ही रोक दिया। कालिन्दी पर्वत यमुनोत्री मन्दिर के लिये स्थाई खतरा बन गया है। सन् 2001 में यमुना नदी में बाढ़ आने से मंदिर का कुछ भाग बह गया था।


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