अमाल्डू में गूंजी जय मां राजराजेश्वरी: भव्य मंदिर स्थापना ने जोड़ी पीढ़ियां और परंपराएं

अमाल्डू में गूंजी जय मां राजराजेश्वरी: भव्य मंदिर स्थापना ने जोड़ी पीढ़ियां और परंपराएं

गढ़वाल की शांत वादियों में बसे जनपद पौड़ी के अमाल्डू गांव में इन दिनों आध्यात्मिक उल्लास और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत संगम देखने को मिला। गांव में मां भगवती श्री राजराजेश्वरी के भव्य मंदिर एवं मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा का पांच दिवसीय आयोजन श्रद्धा, भक्ति और सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण बन गया। 4 से 8 मई तक चले इस आयोजन में न केवल स्थानीय ग्रामीणों ने, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे प्रवासी परिवारों, बेटियों-ब्वारियों और श्रद्धालुओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया।

अमाल्डू गांव में स्थापित यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि अपनी जड़ों से जुड़ने, संस्कृति को संजोने और आने वाली पीढ़ियों को अपनी परंपराओं से परिचित कराने का एक जीवंत केंद्र बनकर उभरा है। लगभग 35 फीट ऊंचे इस मंदिर का निर्माण खुले और रमणीय स्थान पर किया गया है, जहां से शिवालिक पर्वतमाला, भाबर का विस्तृत मैदानी क्षेत्र, महाबगढ़, देवीडांडा और टिहरी गढ़वाल की पर्वत चोटियों के मनोहारी दर्शन होते हैं। मंदिर के ठीक सामने प्रसिद्ध शिव स्थल महाबगढ़ स्थित है, जिससे यह स्थान शिव और शक्ति के दिव्य संगम का प्रतीक बन गया है।

मंदिर का वास्तु विधान भी अत्यंत विशेष माना जा रहा है। गर्भगृह के साथ विशाल सभा मंडप और पारंपरिक शैली में निर्मित संरचना इसकी भव्यता को और बढ़ाती है। मंदिर निर्माण के दौरान वास्तु पूजन में विविध पूजन सामग्री के साथ उनियाल वंशजों की वंशावली भी मंदिर की सतह पर स्थापित की गई, जो इसे सांस्कृतिक और पारिवारिक विरासत का प्रतीक बनाती है।

इस भव्य आयोजन में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल पद्मभूषण भगत सिंह कोश्यारी तथा चिकित्सा, स्वास्थ्य, वन एवं संसदीय कार्य मंत्री सुबोध उनियाल विशेष रूप से उपस्थित रहे। दोनों अतिथियों ने शिलापट्ट का अनावरण कर मां भगवती श्री राजराजेश्वरी का आशीर्वाद प्राप्त किया। आयोजन में दिल्ली, देहरादून, इंदौर सहित विभिन्न शहरों से पहुंचे श्रद्धालुओं और प्रवासी परिवारों ने अपनी सहभागिता से कार्यक्रम को ऐतिहासिक बना दिया।

मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा के दौरान गांव में वर्षों बाद ऐसा भावुक दृश्य देखने को मिला जब कई बहनें, बेटियां और परिजन लगभग 30 वर्षों बाद एक-दूसरे से मिले। इस आयोजन ने केवल धार्मिक आस्था को ही नहीं, बल्कि बिखरते पारिवारिक संबंधों को भी पुनः जोड़ने का कार्य किया।

भगवती श्री राजराजेश्वरी को उनियाल वंशजों की कुलदेवी माना जाता है। वर्षों से परिवार के लोग अपनी कुलदेवी के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए देवलगढ़ स्थित मुख्य पीठ जाया करते थे। किंतु अमाल्डू गांव में शक्ति स्वरूपा मां राजराजेश्वरी का मंदिर नहीं था। नई पीढ़ी के मन में लंबे समय से यह विचार चल रहा था कि गांव में ऐसा केंद्र बने, जहां परिवार और आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति और कुल परंपराओं से जुड़ सकें। इसी संकल्प ने इस भव्य मंदिर निर्माण का रूप लिया।

इस पहल के पीछे “साझा चूल्हा” कार्यक्रम की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अमाल्डू गांव के वरिष्ठ समाजसेवी एवं आईबी से सेवानिवृत्त अधिकारी दिनेश उनियाल की प्रेरणा से यह कार्यक्रम प्रतिवर्ष आयोजित होता रहा है, जिसमें गांव और प्रवासी परिवार एकत्र होकर अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक सरोकारों पर चर्चा करते रहे। इसी मंच पर गांव में कुलदेवी मंदिर निर्माण का विचार आकार लेने लगा।

मंदिर निर्माण के लिए गांव के नत्थी प्रसाद उनियाल, राजेंद्र प्रसाद उनियाल, हरीश चंद्र उनियाल और श्रीकृष्ण उनियाल ने भूमि दान में दी। इसके बाद गांव और प्रवासी परिवारों के सहयोग से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। दिनेश उनियाल, अशोक उनियाल और अन्य वरिष्ठजनों के मार्गदर्शन में डॉ. भूपेश उनियाल, दीपेंद्र उनियाल, प्रदीप उनियाल, नरेश उनियाल, सुनील उनियाल, गिरीश उनियाल सहित युवाओं ने निर्माण कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मंदिर की वास्तु संरचना आर्किटेक्ट हरीश उनियाल द्वारा तैयार की गई, जबकि वैदिक विधि-विधान से पूजन और प्राण प्रतिष्ठा मुख्य आचार्य पं. हरीश उनियाल के मार्गदर्शन में संपन्न हुई। मंदिर प्रवेश द्वार पर स्थापित बटुक भैरव और वीरभद्र की प्रतिमाएं श्रद्धालुओं का विशेष आकर्षण बनी हुई हैं।

पूरे आयोजन में गांव की बेटियों और दिशाध्याणों का योगदान विशेष रूप से सराहनीय रहा। उन्होंने तन, मन और धन से सहयोग कर कार्यक्रम को भावपूर्ण और भव्य स्वरूप प्रदान किया। निकटवर्ती गांव जल्ठ, कूंतणी, गहली, डवली, सिमलखाल और डंगला सहित अनेक क्षेत्रों से पहुंचे ग्रामीणों ने भंडारे में प्रसाद ग्रहण कर आयोजन को सफल बनाया।

अमाल्डू गांव में मां भगवती श्री राजराजेश्वरी मंदिर की स्थापना केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है। यह मंदिर आने वाली पीढ़ियों को अपनी विरासत, संस्कृति और कुल परंपराओं से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनेगा।

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