हिल मेल ब्यूरो, देहरादून
उत्तराखंड सरकार एक तरफ रैबार जैसे आयोजनों से पहाड़ के लोगों को जड़ों से जुड़ने का न्योता दे रही है तो वहीं स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने के लिए भी पहल की गई है। नई पीढ़ी को पहाड़ की बोली, भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज और संगीत व साहित्य से जोड़ने के लिए कुमाउंनी पाठ्य पुस्तकें तैयार कराई गई हैं।
प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने इस पर प्रसन्नता जाहिर करते हुए बताया कि हमारी नई पीढ़ी को अपनी भाषाओं से जोड़ने के लिए गढ़वाली पाठ्य पुस्तकों की तर्ज पर अब कुमाउंनी पाठ्य पुस्तकें भी तैयार हैं। उन्होंने आशा व्यक्त की कि स्कूली बच्चों को कुमाउंनी पाठ्य पुस्तकों के जरिए हमारी संस्कृति और भाषा से जोड़े रखने में मदद मिलेगी।
आपको बता दें कि कुमाउंनी उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में बोली जाने वाली एक बोली है। इस बोली को हिंदी की सहायक पहाड़ी भाषाओं की श्रेणी में रखा जाता है। अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चंपावत, ऊधमसिंह नगर के अलावा असम, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में भी यह बोली जाती है।
मुझे यह बताते हर्ष है कि हमारी नई पीढ़ी को अपनी भाषाओं से जोड़ने के लिए गढ़वाली पाठ्य पुस्तकों की तर्ज पर अब कुमाउंनी पाठ्य पुस्तकें भी तैयार हैं। स्कूली बच्चों को कुमाउंनी पाठ्य पुस्तकों के जरिए हमारी संस्कृति और भाषा से जोड़े रखने में मदद मिलेगी। pic.twitter.com/Bw9WyKU3JM
— Trivendra Singh Rawat (@tsrawatbjp) December 28, 2019
गौर करने वाली बात यह है कि लिपिबद्ध न हो सकने के कारण यह बोली आपसी वार्तालाप के माध्यम तक ही सीमित है। बुजुर्ग कुमांउनी और हिंदी दोनों भाषाओं में संवाद करते हैं। कुमाउंनी, देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। लिपिबद्ध न हो सकने के कारण कुमाउंनी भाषा का कोई साहित्य भी उपलब्ध नहीं है।
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