पहाड़ में लैंडस्लाइड बना सिरदर्द

पहाड़ में लैंडस्लाइड बना सिरदर्द

टनकपुर चम्पावत राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्वाला के समीप आ रहा मलवा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। आज सुबह तो एनएच बड़े बड़े बोल्डरों से पटा हुआ था। मौके पर लगी मशीनों के लिए मलवे को हटाना बड़ी चुनौती बन गया है।

डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

टनकपुर-पिथौरागढ़ एनएच पर डेंजर जोन स्वाला सिरदर्द बन गया है। पिछले 12 सितंबर से यातायात सुचारू नहीं होने से यात्रियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। स्वाला के पास लगातार पहाड़ी से मलबा और पत्थर गिरने के साथ ही पानी का रिसाव हो रहा है। इससे मार्ग लगातार धंसता जा रहा है। ऐसे में मरम्मत का काम भी बाधित हो रहा है। एनएच की मशीनें मलबा और पत्थरों को हटाती रहीं, लेकिन पहाड़ी से लगातार गिरते मलबे के कारण काम करना आसान नहीं रहा। कई बार मशीनों के ऑपरेटरों को भी पहाड़ी से गिरते बड़े-बड़े बोल्डरों के कारण खुद की जान बचाने के लिए पीछे होना पड़ा, लेकिन पहाड़ी से गिरे बोल्डर के चलते मशीन को नुकसान हुआ।

टनकपुर चम्पावत राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्वाला के समीप आ रहा मलवा कम होने का नाम नहीं ले रहा है। आज सुबह तो एनएच बड़े बड़े बोल्डरों से पटा हुआ था। मौके पर लगी मशीनों के लिए मलवे को हटाना बड़ी चुनौती बन गया है। प्रशासन ने फिलहाल आज भी एनएच पर वाहनों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाया है। वहीं व्यापारियों से डीएम ने चार दिन का समय मांगा है। अब देखना होगा कि एनएच पर यातायात कब सामान्य हो पाएगा। पिथौरागढ़ को अन्य बाहरी दुनिया से जोड़ने वाला मुख्य मार्ग घाट-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग जो चंपावत और अल्मोड़ा को जोड़ती है, की बात करें तो टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग की तो 150 किलोमीटर के इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक नहीं बल्कि दर्जनों डेंजर जोन बन गए हैं। जिनके दरकने का खतरा बरसात में ज्यादा रहता है।

सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि यह महत्वाकांक्षी सड़क मलबा आने से पिछले साल 182 बार बंद हुई थी। बरसात का सीजन अपने साथ कई मुसीबतें लेकर आता है खासकर उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में स्थिति और ज्यादा भयावह हो जाती है। यहां आपदा की दृष्टि से अति संवेदनशील जिले पिथौरागढ़ में हर साल बरसात कहर बनकर बरसती है, जिससे जनजीवन काफी प्रभावित होता है। बरसात से होने वाले नुकसान को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन इसे कम जरूर किया जा सकता है, जिसको लेकर पिथौरागढ़ प्रशासन इन दिनों अलर्ट मोड पर है। यहां सड़कों पर लैंडस्लाइड का खतरा ज्यादा रहता है, जिसके लिए जिला प्रशासन ने ऐसे 50 से ज्यादा डेंजर जोनों को चिन्हित किया है, जहां सुधार की जरूरत है। इन्हें ठीक करने के लिए प्रशासन जुटा है।

पिथौरागढ़ की जिलाधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि आपदा प्रबंधन विभाग ने जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग सहित अन्य विभागीय सड़कों पर 50 से ज्यादा डेंजर ज़ोन को चिह्नित किया है, जिनके ट्रीटमेंट के लिए विभागों से प्रपोजल मांगे गए हैं, जिनमें जल्द काम शुरू कर दिया जाएगा। पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग जो चंपावत और अल्मोड़ा को जोड़ती है, की बात करें तो टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग की तो 150 किलोमीटर के इस राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक नहीं बल्कि दर्जनों डेंजर जोन बन गए हैं। जिनके दरकने का खतरा बरसात में ज्यादा रहता है। सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि यह महत्वाकांक्षी सड़क मलबा आने से पिछले साल 182 बार बंद हुई थी। ऑल वेदर रोड पर डेंजर जोनों को अभी तक ना सुधारे जाने पर नाराजगी जाहिर की है। उनका कहना है कि बरसात में जिले के लोगों के लिए सिरदर्द बनने वाले घाट-पिथौरागढ़ सड़क को अभी तक ठीक ना किया जाना सरकार और प्रशासन की मंशा पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने जल्द इन सड़कों पर बने डेंजर जोन के ट्रीटमेंट की मांग की है। पिथौरागढ़ की लाइफ लाइन घाट रोड सुबह मलबा आने से बंद रही। इस दौरान दर्जनों वाहन फंसे रहे। सीमांत जिले में बारिश से मलबा और बोल्डर आने से 14 सड़कें बाधित रहीं।

ग्रामीण क्षेत्र की सड़कें लंबे समय से बंद होने से लोगों को आवाजाही में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। घाट-पिथौरागढ़ सड़क पर घाट बैंड के पास मलबा गिर गया। इससे करीब दो घंटे तक यातायात बाधित रहा। बाद में मलबा हटाकर यातायात सुचारु किया गया। धारचूला-तवाघाट सड़क भी भूस्खलन से कुछ समय के लिए बंद रही। थल-सातशिलिंग सड़क बोल्डर गिरने और भू धंसाव से बंद है। सरकार की ओर से विकास की अनेक योजनाएं बनाए जाने के बावजूद आज हमारा देश अन्य विकसित देशों की तरह विकास के पथ पर अग्रसर होता हुआ नहीं प्रतीत हो रहा है। रोजगार और सामाजिक सुरक्षा आदि की तमाम योजनाएं बनाए जाने के बावजूद तेजी से बढ़ती हमारी जनसंख्या सभी प्रयासों पर पानी फेर देती है। सरकार और समाज मिलकर लोगों की सुविधा के लिए विविध प्रकार के संसाधन जुटाते हैं, लेकिन आबादी के निरंतर बढ़ते बोझ के कारण समस्याएं वहीं की वहीं रह जाती है। यानी तमाम प्रयासों के बावजूद समस्या का समग्र निदान नहीं हो पाता है।

(लेखक दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।)

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