आइए जानते हैं माँ रेणुका जी के बारे में कुछ रोचक तथ्य

आइए जानते हैं माँ रेणुका जी के बारे में कुछ रोचक तथ्य

सिद्ध पीठ माँ रेणुका जी गढ़ पर्वत, बरसाली में विराजमान हैं। माँ रेणुका जी की पूजा-अर्चना हिमाचल, पंजाब, राजस्थान, उत्तराखण्ड से लेकर रंवाई के सारनौल तथा समूचे उत्तरकाशी जिले में की जाती है। लगभग 108 गाँवों की वे आराध्य कुलदेवी हैं।

यमुना नदी के तट पर स्थित थान गाँव (नगाणगाँव) में ऋषि जमदग्नि जी का जन्मस्थान एवं तपस्थली मानी जाती है। माँ रेणुका जी, ऋषि जमदग्नि की धर्मपत्नी तथा भगवान परशुराम जी की माता हैं।

कथा के अनुसार, ऋषि जमदग्नि प्रतिदिन प्रातःकाल थान गाँव से नाकुरी स्थित गंगा तट पर स्नान करने और गंगाजल लेने जाते थे। वृद्धावस्था में यह कार्य माँ रेणुका जी करने लगीं।

एक दिन उन्हें गंगाजल लाने में विलंब हो गया, जिससे ऋषि क्रोधित हो उठे और उन्होंने माँ रेणुका जी को श्राप दे दिया तथा अपने पुत्रों को उनका वध करने का आदेश दिया।

चारों पुत्रों ने इस आदेश का पालन करने से इंकार कर दिया, किंतु पाँचवें पुत्र भगवान परशुराम ने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए माता का वध कर दिया। इससे प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि ने परशुराम को वरदान दिया, जिसके फलस्वरूप उन्होंने माँ रेणुका जी को पुनः जीवित कर दिया। इसके बाद माँ रेणुका जल में विलीन हो गईं।

इसी बीच, ऋषि जमदग्नि ने यमुना तट पर गंगनानी में माँ गंगा की स्तुति कर उनसे वहाँ धारा के रूप में प्रकट होने की प्रार्थना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी वहाँ धारा के रूप में अवतरित हुईं। आज भी इस स्थान पर प्रतिवर्ष भव्य मेला आयोजित होता है।

एक अन्य कथा के अनुसार, माँ रेणुका जी ने गढ़ पर्वत पर महिषासुर मर्दिनी मंदिर में 5000 वर्षों तक तपस्या कर श्राप से मुक्ति प्राप्त की। इसके बाद माँ महाकाली महिषासुर मर्दिनी ने उन्हें उसी स्थान पर विराजमान होने का वरदान दिया। तभी से गढ़ पर्वत पर माँ रेणुका जी का सिद्ध पीठ स्थापित है।

गढ़ पर्वत स्थित मुख्य मंदिर में प्रमुख स्थान पर माँ महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति स्थापित है, जबकि उनके समीप माँ रेणुका जी की प्रतिमा विराजमान है।

प्रत्येक वर्ष बैसाख मास की 3 गते को यहाँ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक मेला “गढ़ का थौलू” आयोजित होता है। इस अवसर पर बरसाली, सिंगोट, पाव, कुन्सी, बौन, जुगुलडी, पंजियाला, गेंवला, मातली आदि ग्रामसभाओं से लोग अपनी-अपनी आराध्य देवी-देवताओं की डोलियों के साथ ढोल-नगाड़ों सहित पहुँचते हैं।

एक लोककथा के अनुसार, प्राचीन समय में जब पहाड़ के लोग मैदानी क्षेत्रों से सामान लाने जाते थे, तो उनकी यात्रा कई महीनों की होती थी। एक बार वापसी के दौरान उन्हें एक छोटी लड़की मिली, जो उनसे विनती कर रही थी कि उसे भी अपने साथ ले चलें। भारी सामान के कारण कोई उसे साथ ले जाने को तैयार नहीं हुआ।

अंततः सिंगोट गाँव के चौहान जाति के एक व्यक्ति ने उसे अपनी पीठ पर बैठा लिया। आश्चर्यजनक रूप से, उसे कोई भार महसूस नहीं हुआ, बल्कि वह अत्यंत हल्का और फुर्तीला महसूस करने लगा। गाँव पहुँचने पर वह लड़की अचानक गायब हो गई।

रात्रि में उस व्यक्ति को स्वप्न में दर्शन देकर उसने बताया कि वह स्वयं माँ रेणुका जी थीं, जो गढ़ पर्वत स्थित अपने सिद्ध पीठ तक पहुँचना चाहती थीं। तभी से सिंगोट गाँव में चौहान जाति के लोगों का घर माँ रेणुका जी का मायका माना जाता है।

आज भी प्रतिवर्ष माँ रेणुका जी को सिंगोट गाँव लाया जाता है, जहाँ तीन दिनों तक उत्सव और मेले का आयोजन होता है। इसके बाद उन्हें पुनः गढ़ पर्वत स्थित मंदिर में विधिवत विदा किया जाता है।

माँ रेणुका जी को कंडाली की सब्जी और कोदे की रोटी का प्रसाद विशेष रूप से प्रिय माना जाता है।

माँ रेणुका जी के मुख्य पुजारी गढ़ रतूड़ी सेरा ग्रामसभा के बहुगुणा परिवार से होते हैं।

– लोकेंद्र सिंह बिष्ट, बरसाली, उत्तरकाशी

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