सबसे पहला और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर एक शेफ की जिम्मेदारी क्या होती है? केशव नेगी दिल्ली में अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए नौकरी कर रहे थे। उनका कार्य रसोई में भोजन तैयार करना था। भवन निर्माण की वैधता, फायर सेफ्टी मानकों का पालन, अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (फायर एनओसी) प्राप्त करना या सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारियों में शामिल नहीं था। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि भवन में सुरक्षा मानकों की अनदेखी हुई थी तो उसका उत्तरदायी कौन है?
किसी भी व्यावसायिक प्रतिष्ठान में सुरक्षा नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आमतौर पर भवन मालिक, संचालक, प्रबंधन और संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों की होती है। यदि जांच में यह सामने आता है कि भवन में अवैध निर्माण हुआ, आपातकालीन निकास व्यवस्था अपर्याप्त थी या अग्निशमन संबंधी नियमों का उल्लंघन किया गया था, तो जवाबदेही उन्हीं लोगों की तय होनी चाहिए जिन्होंने इन व्यवस्थाओं का संचालन और नियंत्रण किया।
इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिस स्थान पर यह गतिविधि संचालित हो रही थी, वह रिहायशी क्षेत्र बताया जा रहा है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि वहां व्यावसायिक गतिविधियां किस आधार पर संचालित की जा रही थीं। क्या संबंधित विभागों ने इसकी अनुमति दी थी? यदि नहीं, तो वर्षों तक यह गतिविधि प्रशासन की नजरों से कैसे बची रही? क्या स्थानीय निकायों, अग्निशमन विभाग और अन्य नियामक संस्थाओं ने समय-समय पर निरीक्षण किया था? यदि किया था तो कमियां क्यों नहीं पकड़ी गईं?
कई बार बड़े हादसों के बाद जनता के गुस्से और दबाव के बीच त्वरित कार्रवाई की जाती है। लेकिन न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि जांच तथ्यों और जिम्मेदारियों के आधार पर हो, न कि केवल किसी एक व्यक्ति को आरोपी बनाकर मामले को समाप्त करने की कोशिश की जाए। यदि कोई कर्मचारी अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र के भीतर काम कर रहा था और उसके पास सुरक्षा संबंधी निर्णय लेने का अधिकार नहीं था, तो उसकी भूमिका का निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी और उसकी दोषसिद्धि दो अलग-अलग बातें हैं। जांच एजेंसियों का दायित्व है कि वे पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष पड़ताल करें और यह स्पष्ट करें कि हादसे की वास्तविक वजह क्या थी तथा इसके लिए कौन-कौन जिम्मेदार हैं। केवल सबसे कमजोर कड़ी को निशाना बनाकर न्याय की स्थापना नहीं की जा सकती।
उत्तराखंड से जुड़े सामाजिक संगठनों और कई लोगों ने भी इस मामले में चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि केशव नेगी जैसे कर्मचारी को पर्याप्त कानूनी सहायता मिलनी चाहिए ताकि वह अपनी बात अदालत के समक्ष प्रभावी ढंग से रख सके। साथ ही जनप्रतिनिधियों और सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी व्यक्ति के साथ केवल परिस्थितियों के आधार पर अन्याय न हो।
21 निर्दोष लोगों की मौत का यह मामला बेहद संवेदनशील और गंभीर है। पीड़ित परिवारों को न्याय मिलना चाहिए और दोषियों को सख्त सजा भी। लेकिन यह तभी संभव होगा जब जांच निष्पक्ष, व्यापक और तथ्यों पर आधारित हो। न्याय का तकाजा यही है कि जिम्मेदारी उसी की तय हो जो वास्तव में जिम्मेदार हो, और जांच की दिशा सबसे कमजोर व्यक्ति नहीं बल्कि असली दोषियों तक पहुंचे।


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