Saturday , 5 September 2026
Home उत्तराखंड न्यूज़ ढोल की थाप में नाचते मुखौटे, जानिए क्यों प्रसिद्ध है चमोली के इस गाँव की रम्माण
उत्तराखंड न्यूज़चमोलीताज़ा ख़बर

ढोल की थाप में नाचते मुखौटे, जानिए क्यों प्रसिद्ध है चमोली के इस गाँव की रम्माण

रम्माण यानि उत्तराखंड कि वो खुबसूरत विधा जिसको विश्वस्तर पर एक अलग पहचान प्राप्त है। रम्माण उत्सव एक प्रसिद्ध उत्सव है जो उत्तराखंड के चमोली जिले के सलूड़ गांव में हर वर्ष वैशाख महीने में मनाया जाता है। यह उत्सव स्थानीय धारोहरिक और सांस्कृतिक परंपराओं को महसूस कराने का एक अवसर प्रदान करता है। इस उत्सव में लोग परम्परागत गीतों, नृत्यों, पर्वतीय खेलों और स्थानीय वस्त्रधारा के आकर्षणों का आनंद लेते हैं। यह उत्सव स्थानीय समुदाय के लोगों के बीच एक मेला और सामुदायिक समारोह के रूप में भी मनाया जाता है। रम्माण उत्सव स्थानीय संस्कृति और विरासत की गरिमा को बढ़ावा देने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

यूनेस्को ने 2009 इस उत्सव को राष्ट्रीय धरोहर भी घोषित किया है। यह धार्मिक विरासत 500 वर्षों से चली आ रही है। इसमें राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान के पात्रों द्वारा नृत्य शैली में रामकथा की प्रस्तुति दी जाती है।

इसमें 18 मुखौटे 18 ताल, 12 ढोल, 12 दमाऊं, 8 भंकोरे का प्रयोग होता है। इसके अलावा रामजन्म, वनगमन, स्वर्ण मृग वध, सीता हरण और लंका दहन का मंचन ढोलों की थापों पर किया गया। इसमें कुरू जोगी, बण्यां-बण्यांण और माल के विशेष चरित्र होते हैं। यह लोगों को खूब हंसाते हैं। साथ ही वन्‍यजीवों के आक्रमण का मनमोहक चित्रण म्योर-मुरैण नृत्य नाटिका होती है। ये पात्र लोगो हसांते तो है ही लेकिन इनका मंचन इतना बेहतरीन होता है की ये सबका मन मोह लेते है।

रम्माण के अंत में भूम्याल देवता प्रकट होते हैं। समस्त ग्रामीण भूम्याल देवता को एक परिवार विशेष के घर विदाई देने पहुंचते हैं। उसी परिवार द्वारा साल भर भूम्याल देवता की पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद उस घर के आंगन में प्रसाद बांटा जाता है। इसके साथ ही इस पौराणिक आयोजन का समापन होता है।

उत्सव में गाँव ध्यानियों यानी बेटियों को विशेष रूप बुलवाया जाता है। रात्रि के समय प्रांगण में महिलाए और पुरुष मिलकर चांचड़ी लगाते है। यह उत्सव देव पूजा के साथ साथ कई भावनात्मक पहलुओं से जुड़ा हुआ है।

Written by
Hill Mail

हिल-मेल का प्रयास जनमानस की आवाज को सही स्तर तक पहुंचाना है। हमने कोशिश की है कि हिल-मेल पहाड़ से जुड़े जनमानस के बीच एक मंच और एक अभियान के रूप में आगे बढ़े। हिल-मेल प्रयत्न कर रहा है कि हिमालय के आंचल में रोजाना की घटने वाली सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और दैवीय घटनाओं की जानकारी जल्दी से जल्दी लोगों को मिलती रहे।

Leave a comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

प्रेशर हॉर्न पर अब सख्ती, दूसरी बार पकड़े जाने पर ₹10 हजार चालान

उत्तराखंड में वाहनों में प्रेशर हॉर्न लगाने और उनका अनावश्यक इस्तेमाल करने...