उत्तराखंड को लंबे समय से देश की “वीरभूमि” और “सैनिक प्रदेश” के रूप में जाना जाता है। राज्य के लगभग प्रत्येक पाँचवें परिवार का कोई न कोई सदस्य सेना, अर्धसैनिक बलों या पूर्व सैनिक समुदाय से जुड़ा हुआ है। ऐसे प्रदेश में सैनिकों के सम्मान से जुड़ी किसी भी पहल का महत्व केवल प्रशासनिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक भी होता है। यही कारण है कि देहरादून में निर्मित “सैन्य धाम” परियोजना आरम्भ से ही चर्चा और विवाद दोनों का विषय बनी हुई है।
वर्ष 2019 में रुद्रपुर की एक जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तराखंड में सैन्य धाम को “पाँचवें धाम” के रूप में विकसित करने की घोषणा की थी। इसके बाद दिसंबर 2021 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने देहरादून के गुनियाल (पुरूकुल) क्षेत्र में इस परियोजना का शिलान्यास किया। लगभग चार हेक्टेयर भूमि पर निर्मित इस स्मारक की लागत प्रारम्भिक अनुमान से बढ़कर लगभग 101 करोड़ रुपये तक पहुँच गई। लागत में हुई इस उल्लेखनीय वृद्धि ने परियोजना की वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर प्रश्न खड़े किए हैं।
हालाँकि सबसे बड़ा विवाद इसकी लागत नहीं, बल्कि इसे “पाँचवाँ धाम” कहे जाने को लेकर है। भारतीय सनातन परम्परा में चार धाम बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम विशिष्ट धार्मिक महत्व रखते हैं। उत्तराखंड में प्रचलित छोटा चारधाम भी अपनी अलग धार्मिक पहचान रखता है। ऐसे में किसी सैनिक स्मारक को “धाम” की संज्ञा देना अनेक लोगों को धार्मिक अवधारणा के विस्तार से अधिक राजनीतिक प्रतीक निर्माण का प्रयास प्रतीत होता है।
सैनिक समुदाय के एक वर्ग का तर्क है कि शहीदों और सैनिकों के सम्मान के लिए विश्वभर में युद्ध स्मारकों की परम्परा रही है, न कि धामों की। भारत में भी नई दिल्ली स्थित इंडिया गेट, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक तथा विभिन्न राज्यों के युद्ध स्मारक इसी परम्परा का हिस्सा हैं। उत्तराखंड का अपना राज्य युद्ध स्मारक भी 2023 में देहरादून में राष्ट्र को समर्पित किया जा चुका है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब सैनिक सम्मान के स्थापित और स्वीकृत स्वरूप पहले से मौजूद हैं, तब सैन्य धाम जैसी नई अवधारणा की आवश्यकता क्यों महसूस की गई?
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भारतीय सेना की धर्मनिरपेक्ष और समावेशी संस्कृति से जुड़ा है। भारतीय सेना की पहचान किसी एक धर्म, जाति या क्षेत्र से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सर्वधर्म समभाव से निर्मित हुई है। सेना में हर पृष्ठभूमि के सैनिक समान राष्ट्रीय ध्वज के नीचे सेवा करते हैं। इसी कारण कुछ पूर्व सैनिक यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या किसी सैन्य स्मारक को धार्मिक अर्थ वाले “धाम” शब्द से जोड़ना सेना की मूल भावना के अनुरूप है? उनके अनुसार सैनिक सम्मान को धार्मिक प्रतीकों से जोड़ने के बजाय राष्ट्रीय और सैन्य मूल्यों के आधार पर ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
सैन्य धाम के स्थान चयन को लेकर भी सवाल उठे हैं। यह स्मारक देहरादून के गुनियाल गाँव में बनाया गया है, जबकि यह क्षेत्र न तो किसी ऐतिहासिक युद्ध का स्थल रहा है और न ही किसी प्रमुख सैन्य अभियान से जुड़ा हुआ है। आलोचकों का कहना है कि यदि यह परियोजना सैनिक इतिहास और परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करती है, तो स्थान चयन के मानदंडों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए था। पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे निर्णयों के पीछे की प्रक्रिया जनता के सामने होना स्वाभाविक अपेक्षा है।
परियोजना का एक भावनात्मक पक्ष भी है। राज्य के 1742 वीर सैनिकों के घरों से मिट्टी एकत्र कर स्मारक परिसर में स्थापित की गई है। निस्संदेह यह पहल शहीदों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक संवेदनशील प्रयास है। किन्तु कुछ पूर्व सैनिकों का मानना है कि सैनिकों के बलिदान को किसी राजनीतिक अभियान या चुनावी प्रतीकवाद से जोड़ा जाना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि सैनिक राष्ट्र के लिए बलिदान देता है, किसी सरकार, दल या राजनीतिक विचारधारा के लिए नहीं।
इसी संदर्भ में कई पूर्व सैनिकों ने समय-समय पर अपनी आपत्तियाँ दर्ज कराई हैं। उनका कहना है कि सेना की गौरवशाली परम्पराएँ किसी भी राजनीतिक नेतृत्व से कहीं अधिक स्थायी और व्यापक हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें और नेतृत्व बदलते रहते हैं, किन्तु सशस्त्र सेनाओं की संस्थागत गरिमा और परम्पराएँ पीढ़ियों तक कायम रहती हैं। इसलिए सैन्य संस्कृति से जुड़े प्रतीकों और परम्पराओं में किसी भी प्रकार के परिवर्तन से पूर्व व्यापक सैनिक समुदाय की सहमति आवश्यक मानी जानी चाहिए।
उत्तराखंड राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर सैन्य धाम के प्रस्तावित लोकार्पण को लेकर भी सैनिक समुदाय के एक वर्ग ने विरोध दर्ज कराया था। उनका मत था कि जब तक परियोजना से जुड़े सभी प्रश्नों चाहे वे अवधारणा, व्यय, स्थान चयन या राजनीतिक निष्पक्षता से संबंधित हों का संतोषजनक समाधान नहीं हो जाता, तब तक इसका औपचारिक उद्घाटन सैनिक सम्मान का उत्सव नहीं माना जा सकता।
वास्तव में किसी भी स्मारक की वैधता केवल उसकी भव्यता, वास्तुकला या लागत से निर्धारित नहीं होती। उसका वास्तविक महत्व उस सम्मान, स्वीकृति और भावनात्मक जुड़ाव में निहित होता है जो संबंधित समुदाय उसे प्रदान करता है। यदि सैनिक समुदाय का एक महत्वपूर्ण वर्ग स्वयं को इस परियोजना से जुड़ा हुआ महसूस नहीं करता, तो उसके उद्देश्य और प्रभावशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
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