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उत्तराखंड न्यूज़देहरादूनसरोकार

31 वर्षों से बेटे के दर्द की साथी बनी मां, आंदोलन की एक घटना ने बदल दी जिंदगी

मां सिर्फ जन्म देने वाली नहीं होती, वह अपने बच्चों के हर दर्द को खुद में समेट लेने वाली शक्ति भी होती है। इसका जीता-जागता उदाहरण हैं 80 वर्षीय नीलम ओबराय, जो पिछले 31 वर्षों से अपने बेटे अमित ओबराय की सेवा में दिन-रात जुटी हुई हैं। उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी आंखों में बस एक ही सपना है उनका बेटा एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ा हो सके और खुली दुनिया को देख सके।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान एक हादसे ने अमित ओबराय की जिंदगी पूरी तरह बदल दी। कभी सपनों और ऊर्जा से भरा किशोर आज तीन दशकों से बिस्तर पर जिंदगी बिताने को मजबूर है। लेकिन इस लंबे संघर्ष में उनकी मां नीलम ओबराय ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने बेटे की सेवा को ही अपना जीवन बना लिया।

अमित ओबराय बताते हैं कि 2 अक्तूबर 1994 के मुजफ्फरनगर कांड की बरसी पर अक्तूबर 1995 में देहरादून में बड़ी संख्या में आंदोलनकारी एकत्र हुए थे। उस समय अमित की उम्र महज 16 वर्ष थी। स्कूल बंद होने के कारण वह भी आंदोलनकारियों के बीच पहुंच गए। उनके पिता जयकृष्ण ओबराय भी उत्तराखंड आंदोलन में सक्रिय थे।

रिस्पना पुल पर आंदोलनकारियों की भारी भीड़ थी। इसी दौरान एक काफिले को निकालने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। भगदड़ और अफरा-तफरी के बीच अमित का संतुलन बिगड़ गया और वे पुल से नीचे सूखी नदी में पत्थरों पर जा गिरे। गंभीर रूप से घायल अमित करीब चार घंटे तक वहीं पड़े रहे। बाद में पुलिस ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, लेकिन तब तक उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल चुकी थी।

उस हादसे के बाद अमित लकवे का शिकार हो गए। शरीर ने जवाब दे दिया, लेकिन मां नीलम ओबराय ने उम्मीद नहीं छोड़ी। पिछले 31 वर्षों से वह बेटे की हर जरूरत का ख्याल रख रही हैं। सुबह से लेकर रात तक उनकी पूरी दिनचर्या बेटे की देखभाल में गुजरती है। उम्र बढ़ने के साथ उनकी शारीरिक ताकत जरूर कमजोर हुई है, लेकिन बेटे के प्रति उनका समर्पण आज भी उतना ही मजबूत है।

प्रगति विहार स्थित घर में अमित का संसार अब चारदीवारी तक सीमित है, लेकिन उनकी मां हर दिन उन्हें हौसला देती हैं। नीलम ओबराय कहती हैं कि उन्हें अपनी परेशानियों की चिंता नहीं है। उनकी सबसे बड़ी इच्छा यही है कि उनका बेटा फिर से सामान्य जीवन जी सके।

यह कहानी सिर्फ एक मां और बेटे की नहीं, बल्कि उस संघर्ष, त्याग और ममता की भी है, जो हर कठिन परिस्थिति से बड़ी होती है। नीलम ओबराय ने यह साबित कर दिया कि मां का प्रेम समय और परिस्थितियों से कहीं अधिक मजबूत होता है।

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Hill Mail

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