भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली की अखिल भारतीय समन्वित मक्का पर शोध परियोजना की तीन-दिवसीय 66वीं वार्षिक कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में विश्वविद्यालय के कुलपति डा. मनमोहन सिंह चौहान ने कहा कि पिछले दशकों में वैज्ञानिकों के प्रयासों से मक्का के उत्पादन में 16 गुना की वृद्धि हुई है और अब आवश्यकता है गुणवत्तायुक्त मक्का के उत्पादों को उचित बाजार दर पर उपलब्ध कराये जाने की है। जैव प्रौद्योगिकी का प्रयोग कर मक्का की और अधिक गुणवत्तायुक्त नवीन प्रजातियां विकसित करने की आवश्यकता है।
पौष्टिक भोजन के अभाव में एक आकडे़ के अनुसार भारत में पांच प्रतिशत बच्चे स्टंटिंग तथा 23 प्रतिशत कुपोषण के शिकार हैं। अतः गुणवत्तायुक्त मक्के का भोजन में उपयोग इस समस्या के समाधान में कारगर साबित हो सकता है। तराई क्षेत्र में ग्रीष्मकालीन धान की खेती एक गम्भीर प्रकरण है क्योंकि ग्रीष्मकालीन धान के उत्पादन में लगभग दोगुना पानी की आवश्यकता होती है जिसके कारण तराई में भूमिगत जल का स्तर लगातार कम होता जा रहा है।

इस समस्या के समाधान हेतु ग्रीष्मकालीन धान के स्थान पर मक्का की खेती एक अच्छे विकल्प के रूप में किसानों द्वारा अपनाई जा सकती है। वर्तमान समय में यह अतिआवश्यक है कि विविधतायुक्त शोध किये जायें जिसमें कृषि के विभिन्न अवयवों का जैसे मोटे आनाज, खाद्यान्न, सब्जी, मुर्गी, पशुपालन, मौनपालन, कृषिवानिकी आदि का समावेश किया जाना आवश्यक है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक, डा. ए.के. प्रधान, विशिष्ट अतिथि ने बताया कि मक्का उत्पादन की दृष्टि से विश्व की नम्बर एक फसल है। भारत में कृषि आधारित उद्योगों में मक्का की बहुत अधिक मांग हैं। वर्तमान में मक्का की बाजार में मांग को देखते हुए और अधिक उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। असिंचित क्षेत्रों में मक्का की खेती एक लाभकारी विकल्प हो सकता है जिसके लिए आवश्यकता है कि स्थानीय स्तर हेतु अनुकूल प्रजाति का विकास किया जाएं। उन्होंने आणविक विधि में जिनोम असिस्टेड ब्रीडिंग के द्वारा एक साथ कई जीन का समावेश कर वातावरण की चुनौतियों का सामना करने हेतु प्रजातियों के विकास पर बल दिया।
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राष्ट्रीय मक्का शोध संस्थान, लुधियाना के पूर्व निदेशक, डा. साई दास ने कहा कि वर्तमान में मक्का की खेती धान के लिए एक विकल्प के रूप में उभर रही है क्योंकि किसानों को धान-गेहूं फसल प्रणाली में लाभ कम हो रहा है। मक्का में भारत आयातक से निर्यातक बन गया। आज भारत देश मक्का के बीजों का भी निर्यात कर रहा है।
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर के पूर्व कुलपति डा. एम.पी. पाण्डे ने कहा कि मक्के के उत्पादन को बढ़ाने में संकर प्रजातियों का महत्वपूर्ण योगदान है। मक्का की मांग राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में लगातार बढ़ती जा रही है, जिसको और अधिक उत्पादन देने वाली गुणवत्तायुक्त संकर प्रजातियों के विकास करके सम्भव किया जा सकता है।
राष्ट्रीय मक्का शोध संस्थान, लुधियाना के निदेशक, डा. एच.एस. जाट ने अखिल भारतीय समन्वित मक्का के अंतर्गत वर्ष 2022-23 में किये गये कार्यों की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत किया तथा बताया कि 1950-51 में जहां भारत में 2.50 मिलियन टन मक्के का उत्पादन होता था, वहीं अब बढ़कर 34 मिलियन टन हो गया है, जिसके लिए देश के विभिन्न संस्थानों में मक्का शोध पर कार्य कर रहे वैज्ञानिक बधाई के पात्र है।
इस कार्यक्रम में मक्का शोध एवं प्रसार में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्ट कार्य कर चुके वैज्ञानिक डा. बी.डी. अग्रवाल, डा. आई.एस. सिंह, डा. सितार सिंह वर्मा, डा. आर.सी. गौतम, डा. एच.एन. सिंह को मुख्य अतिथि द्वारा सम्मानित किया गया। उत्तराखंड में मक्का की फसल को उगा रहे प्रगतिशील किसान सुरेश राणा, ग्राम खैराना, ऊधमसिंह नगर, जिनकी मन की बात कार्यक्रम में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रशंसा की गयी थी, नैनीताल से नरोत्तम जोशी एवं जौनसार से नरेश बहुगुणा को मुख्य अतिथि द्वारा उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में विश्वविद्यालय के निदेशक शोध डा. ए.एस. नैन ने अतिथियों एवं प्रतिभागियों का स्वागत किया एवं कहा कि यह तीन-दिवसीय कार्यशाला में मंथन के परिणाम वैज्ञानिकों शोधकर्ताओं, छात्रों एवं किसानों हेतु महत्वपूर्ण होंगे। अखिल भारतीय समन्वित मक्का पर शोध परियोजना के राष्ट्रीय समन्वयक डा. रमेश कुमार द्वारा अतिथियों एवं वैज्ञानिकों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
कार्यक्रम में कार्यशाला के आयोजक सचिव, डा. आर.पी. सिंह, सहसचिव डा. एन.के. सिंह, निदेशक संचार डा. जे.पी. जायसवाल, अधिष्ठाता, पशुचिकित्सा एवं पशुपालन विज्ञान, डा. एस.पी. सिंह के साथ डा. शैलबाला, डा. रश्मि तिवारी, भारत के विभिन्न संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों से आये 350 वैज्ञानिकों एवं शोधार्थियों ने प्रतिभाग किया। कार्यशाला के द्वितीय सत्र में सस्य विज्ञान, पादप प्रजनन विज्ञान एवं फसल सुरक्षा विषयों पर वैज्ञानिकों द्वारा गहन मंथन किया गया तथा विगत वर्ष किये गये कार्यों का प्रस्तुतिकरण किया गया। कार्यशाला में विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा लिखित पुस्तकों का भी अतिथियों द्वारा विमोचन किया गया।


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