उत्तराखंड के पहाड़ी गांव अब केवल प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और सकारात्मक बदलाव के लिए भी पहचान बना रहे हैं। टिहरी जिले के भिलंगना ब्लॉक स्थित कैपार्स-बासर गांव और कर्णप्रयाग विकासखंड के चमाली गांव ने एक ऐसी पहल शुरू की है, जो पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बनती जा रही है। इन गांवों में शादी समारोहों, मांगलिक आयोजनों और सामाजिक कार्यक्रमों में शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया है।
कैपार्स-बासर गांव में यह अभियान पिछले एक वर्ष से सफलतापूर्वक चल रहा है। ग्राम प्रधान रतन सिंह रावत ने पदभार संभालने के बाद गांव को नशामुक्त बनाने का संकल्प लिया था। उन्होंने ग्रामीणों के साथ बैठकों का आयोजन कर शराब के दुष्प्रभावों पर चर्चा की और सामूहिक सहमति से सामाजिक आयोजनों में शराब बंद करने का निर्णय लिया। इस पहल को सफल बनाने के लिए पंचायत ने एक सख्त नियम भी बनाया, जिसके तहत किसी भी समारोह में शराब परोसने पर 21 हजार रुपये का जुर्माना तय किया गया।
गांव के लोगों ने इस निर्णय को केवल नियम के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में अपनाया। ग्राम प्रधान स्वयं शादी और अन्य आयोजनों में पहुंचकर निगरानी करते हैं ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके। बीते एक वर्ष में गांव में 10 से अधिक शादियां बिना शराब के शांतिपूर्ण और पारंपरिक तरीके से संपन्न हुई हैं। ग्रामीणों का कहना है कि इससे न केवल आयोजनों का माहौल बेहतर हुआ है, बल्कि पारिवारिक विवाद और अनावश्यक खर्च भी कम हुए हैं।
इस अभियान में उप प्रधान योगेंद्र सिंह विष्ट सहित कई ग्रामीण सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। नशा मुक्ति संगठनों और पुलिस प्रशासन के सहयोग से गांव में समय-समय पर जागरूकता बैठकें भी आयोजित की गईं, जिनमें युवाओं और महिलाओं को शराब से होने वाले नुकसान के बारे में बताया गया।
इसी तरह कर्णप्रयाग विकासखंड का चमाली गांव भी अब नशामुक्त गांवों की सूची में शामिल हो गया है। यहां महिला मंगल दल और ग्रामीणों ने मिलकर सामाजिक कार्यक्रमों में शराब पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया है। गांव की सड़क पर “नशामुक्त गांव” का बोर्ड लगाकर लोगों को स्पष्ट संदेश दिया गया है कि गांव में शराब सेवन स्वीकार नहीं किया जाएगा।
महिला मंगल दल अध्यक्ष चंद्रकला देवी और ग्राम प्रधान गजपाल सिंह की मौजूदगी में हुई बैठक में निर्णय लिया गया कि यदि कोई व्यक्ति शराब पीते या पिलाते हुए पाया गया, तो उस पर पहली बार में ही 20 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। बार-बार नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की भी चेतावनी दी गई है।
ग्रामीणों का मानना है कि शराबबंदी से गांव का सामाजिक वातावरण सुधरेगा, महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित माहौल मिलेगा और नई पीढ़ी बेहतर संस्कारों के साथ आगे बढ़ेगी। उत्तराखंड के ये गांव यह साबित कर रहे हैं कि यदि समाज एकजुट हो जाए, तो बिना किसी बड़े सरकारी अभियान के भी बड़ा बदलाव संभव है।







