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पानी को तरसता पद्मश्री का गांव: 11 महीने से बूंद-बूंद को मोहताज 200 परिवार, ‘हर घर नल’ योजना बनी सफेद हाथी

एक ओर सरकार जल जीवन मिशन और ‘हर घर नल’ योजना के जरिए प्रत्येक ग्रामीण परिवार तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर पौड़ी गढ़वाल के विकासखंड एकेश्वर की मवालस्यूं पट्टी के मासौं थपलियाल और मासौं मसेटा गांवों के करीब 200 परिवार पिछले 11 महीनों से गंभीर पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं। विडंबना यह है कि इस क्षेत्र में पद्मश्री सम्मानित समाजसेवी एवं शिक्षाविद् डॉ. यशवंत सिंह कठोच का पैतृक गांव भी शामिल है, लेकिन शिकायतों और प्रशासनिक निर्देशों के बावजूद आज तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।

ग्रामीणों के अनुसार केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘हर घर नल’ योजना के तहत गांवों के लिए पेयजल आपूर्ति व्यवस्था तैयार की गई थी। गांव से लगभग छह किलोमीटर दूर स्थित पिनगढ़ गदेरे से पानी लाकर घरों तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई थी। शुरुआती कुछ महीनों तक योजना सुचारु रूप से चली, जिससे लोगों को राहत मिली। लेकिन 11 जुलाई 2025 से जलापूर्ति पूरी तरह ठप हो गई और इसके बाद पांच अगस्त को आई आपदा ने योजना को और अधिक क्षतिग्रस्त कर दिया। तब से लेकर आज तक ग्रामीणों को नलों से पानी नसीब नहीं हो पाया है।

ग्राम प्रधान सूरजपाल और संतोषी बिष्ट का कहना है कि योजना के बंद होने के बाद ग्रामीणों को फिर से पुराने स्रोतों, गदेरों और प्राकृतिक जलधाराओं पर निर्भर होना पड़ रहा है। महिलाओं और बुजुर्गों को रोजाना लंबी दूरी तय कर पानी लाना पड़ता है, जिससे उनका समय और श्रम दोनों प्रभावित हो रहे हैं। गर्मी के मौसम में स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है, जब जलस्रोतों का जलस्तर भी कम होने लगता है।

इस समस्या को लेकर पद्मश्री डॉ. यशवंत सिंह कठोच ने भी पिछले वर्ष तत्कालीन जिलाधिकारी डॉ. आशीष चौहान से शिकायत की थी। जिलाधिकारी द्वारा संबंधित विभाग को आवश्यक निर्देश भी दिए गए थे, लेकिन धरातल पर स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। ग्रामीणों का आरोप है कि विभागीय स्तर पर केवल आश्वासन दिए जाते रहे, जबकि क्षतिग्रस्त पाइपलाइन और अन्य तकनीकी खामियों को दूर करने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।

ग्रामीणों का कहना है कि करोड़ों रुपये की लागत से बनाई गई जल जीवन मिशन की पाइपलाइन अब जंग खा रही है और योजना ‘सफेद हाथी’ बनकर रह गई है। सेवानिवृत्त शक्तिचरण शाह और शिवचरण शाह बताते हैं कि गांव में पानी की समस्या इतनी गंभीर है कि बाहर रहने वाले लोग गांव आने से पहले सबसे पहले पानी की उपलब्धता के बारे में जानकारी लेते हैं। यदि पानी नहीं होता तो कई बार उनके गांव आने के कार्यक्रम स्थगित करने पड़ते हैं।

प्रवासी ग्रामीण संतोष थपलियाल का कहना है कि उनके बच्चे गांव आने की इच्छा जताते हैं और उनका स्वयं भी कुछ समय गांव में बिताने का मन करता है, लेकिन पेयजल संकट के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता। उनका कहना है कि यदि बुनियादी सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं होंगी तो गांवों से पलायन रोकना मुश्किल हो जाएगा।

ग्रामीणों का आरोप है कि लंबे समय से जल संकट झेलने के बावजूद विभागीय अधिकारियों ने समस्या को गंभीरता से नहीं लिया। उनका कहना है कि यदि समय रहते योजना की मरम्मत और रखरखाव किया जाता तो आज यह स्थिति पैदा नहीं होती। अब ग्रामीण प्रशासन और सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं।

इस मामले में अधीक्षण अभियंता जल संस्थान पौड़ी प्रवीण सैनी ने बताया कि पद्मश्री डॉ. यशवंत कठोच के गांव मांसौं में पेयजल आपूर्ति बाधित होने की शिकायत प्राप्त हुई है। उन्होंने कहा कि अधिशासी अभियंता जल संस्थान पौड़ी को आवश्यक निर्देश जारी कर दिए गए हैं और जल्द ही जलापूर्ति बहाल करने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि ग्रामीणों को राहत मिल सके।

फिलहाल, 11 महीनों से पेयजल संकट झेल रहे इन गांवों के लोगों की निगाहें प्रशासन और जल संस्थान की कार्रवाई पर टिकी हैं। सवाल यह है कि जब पद्मश्री सम्मानित व्यक्तित्व के गांव की समस्या तक समय पर हल नहीं हो पा रही, तो दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले आम लोगों की समस्याओं के समाधान की गति का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। ग्रामीणों की मांग है कि आश्वासनों के बजाय अब धरातल पर काम दिखाई देना चाहिए, ताकि हर घर तक पानी पहुंचाने का सपना वास्तव में साकार हो सके।

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Hill Mail

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