उत्तराखंड का पौड़ी जिला इन दिनों वन्यजीवों की दहशत में जी रहा है। पहाड़ के गांवों में शाम ढलते ही डर का सन्नाटा फैल जाता है। कहीं गुलदार खेतों और घरों के आसपास मंडरा रहा है, तो कहीं भालू लोगों पर हमला कर रहा है। बंदरों के आतंक ने ग्रामीणों की खेती और घरों की सुरक्षा तक छीन ली है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन उनसे निपटने के लिए वन विभाग के पास न पर्याप्त कर्मचारी हैं और न ही पर्याप्त संसाधन।
राज्य गठन के बाद पुलिस और परिवहन विभाग में नए थाने, चौकियां और कार्यालय खोले गए, लेकिन वन विभाग की स्थिति लगभग जस की तस बनी हुई है। उत्तराखंड में 70 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र वन भूमि है और मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर होता जा रहा है। इसके बावजूद वन प्रभागों का पुनर्गठन वर्षों से केवल फाइलों तक सीमित है।
गढ़वाल वन प्रभाग, जहां सबसे अधिक वन्यजीव हमलों की घटनाएं हो रही हैं, वहां स्वीकृत पदों के मुकाबले बड़ी संख्या में पद खाली पड़े हैं। छह रेंजर पदों में एक रिक्त है, 12 डिप्टी रेंजर पदों में आठ खाली हैं। इसी तरह 54 वन दरोगाओं में 15 और 89 वन आरक्षियों में 20 पद रिक्त हैं। सीमित स्टाफ के भरोसे विशाल जंगलों और बढ़ते संघर्ष को संभालना विभाग के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा वन विभाग के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। वर्ष 2023 से 2025 तक गढ़वाल वन प्रभाग में मानव-वन्यजीव संघर्ष की 246 घटनाएं दर्ज हुईं। इनमें 14 लोगों की मौत हुई, जबकि 232 लोग घायल हुए। केवल वर्ष 2025 में ही 116 घटनाएं सामने आईं, जो राज्य में सबसे अधिक थीं। वहीं जनवरी 2026 से 15 मार्च तक 16 घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि अब गांवों में सामान्य जीवन भी खतरे से खाली नहीं रहा। कमेड़ा ग्राम सभा की सावित्री ममगाई बताती हैं कि बंदरों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि घरों की छतों पर लोहे की जाली लगानी पड़ी। वहीं गुलदार का डर अलग बना हुआ है। खिसू गांव के मदन सिंह रावत कहते हैं कि बर्फबारी के दौरान उन्होंने घर के पास सड़क पर गुलदार को घूमते देखा था। भालुओं की गतिविधियों ने भी ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि पूरे गढ़वाल वन प्रभाग में वन्यजीवों से निपटने के लिए केवल 12 बंदूकें और पांच ट्रैंक्यूलाइजर गन उपलब्ध हैं। तेंदुए पकड़ने के लिए 27 पिंजरे, बाघ के चार और भालू के सिर्फ दो पिंजरे हैं। पूरे क्षेत्र के लिए केवल एक त्वरित प्रतिक्रिया बल और छह वाहन उपलब्ध कराए गए हैं।
वन्यजीवों को पकड़ने के बाद रखने के लिए पूरे गढ़वाल में एक भी रेस्क्यू या ट्रांजिट सेंटर नहीं है। स्थायी पशु चिकित्सक की नियुक्ति भी नहीं की गई है। ऐसे में किसी भी रेस्क्यू अभियान को संचालित करना बेहद कठिन हो जाता है।
वन विभाग के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि संवेदनशील क्षेत्रों में टीमों की तैनाती की जा रही है और रेस्क्यू सेंटर की योजना पर काम चल रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पौड़ी के गांव आज भी खौफ के पंजों में जकड़े हुए हैं। ग्रामीणों को अब केवल जंगल से नहीं, बल्कि अपने ही आंगन में मंडराते खतरे से डर लगने लगा है।







