उत्तराखंड, जिसे श्रद्धा और आस्था की भूमि “देवभूमि” कहा जाता है, आज एक गंभीर सामाजिक संकट से जूझ रहा है—बढ़ता नशा। हाल के वर्षों में राज्य के युवाओं में नशे की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, जो समाज और भविष्य दोनों के लिए चिंता का विषय बन चुकी है। विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार लगभग 30% से अधिक युवा किसी न किसी प्रकार के नशे की गिरफ्त में हैं। शराब, गांजा और स्मैक के साथ-साथ अब सिंथेटिक ड्रग्स जैसे MDMA का प्रचलन भी तेजी से बढ़ रहा है।
इस समस्या के पीछे कई कारण छिपे हैं। बेरोजगारी, बढ़ता मानसिक दबाव, और पर्यटन क्षेत्रों में नशे की आसान उपलब्धता ने हालात को और बिगाड़ दिया है। युवाओं में बढ़ती निराशा और गलत संगत भी उन्हें इस दलदल की ओर धकेल रही है। कई मामलों में देखा गया है कि नशे की शुरुआत दोस्तों के प्रभाव से होती है, जो धीरे-धीरे लत में बदल जाती है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि अब नशे का जाल स्कूलों और कॉलेजों तक फैल चुका है। किशोर अवस्था में ही युवा इसकी चपेट में आ रहे हैं, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है। साथ ही, ड्रग तस्करी के बढ़ते मामले इस बात का संकेत हैं कि यह समस्या अब संगठित रूप ले चुकी है।
समाधान के लिए सरकार को केवल जागरूकता अभियानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ठोस और प्रभावी कदम उठाने होंगे। सीमावर्ती क्षेत्रों में कड़ी निगरानी, शैक्षणिक संस्थानों में नियमित जागरूकता कार्यक्रम, और नशा मुक्ति केंद्रों का विस्तार अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और उन्हें सकारात्मक दिशा देना भी बेहद जरूरी है।
यदि समय रहते इस समस्या पर सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो देवभूमि की पहचान पर गहरा असर पड़ेगा और आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।







