वनाग्नि एक ग्लोबल इश्यू
वन मंत्री सुबोध उनियाल का कहना है कि फारेस्ट पर्यावरण की दृष्टि से वनाग्नि उत्तराखंड का ही नहीं बल्कि ग्लोबल इश्यू है। बिना जन सहभागिता के जंगलों में आग लगने की घटनाओं पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती है। वह कहते हैं कि जब सरकार का मैकेनिज्म नहीं था और मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रमुख सचिव और सविच नहीं होते थे, तब भी जंगलों में आग लगती थी और इस पर अंकुश स्थानीय लोगों की भागीदारी से ही लगता था। सरकार और फॉरेस्ट विभाग जंगलों में लगने वाली आग को रोकने में पुरजोर तरीके से जुटा हुआ है, लेकिन इसमें जनभागीदारी भी जरूरी है।
हमारी सरकार ने लोगों का जंगल से कनेक्शन फिर से जोड़ा है। इसके लिए वन कानून में कई सुधार किए गए हैं। पहले 27 प्रजातियों के पेड़ों को चाहे वो अपनी जमीन पर हों या फिर किसी और की जमीन पर, उन्हें काटने के लिए किसान को वन विभाग के चक्कर लगाने पड़ते थे, लेकिन अब यह प्रतिबंध सिर्फ 15 प्रजातियों के पेड़ों पर ही रखा गया है। हमारे यहां 11230 वन पंचायते हैं। हमने वन पंचायत में संशोधन किया और अब वन पंचायत के लोग वन पंचायत की जमीन पर खेती कर सकते हैं। खेती में जो भी उत्पाद होगा, उस उत्पाद पर उसकी हारवेस्टिंग करके, उसकी मार्केटिंग भी कर सकते हैं और उससे जो पैसा आयेगा वह उन्हीं लोगों में बंटेगा।

फॉरेस्ट फायर को डिजास्टर से जोड़ा है ताकि फौरन फंड मिल सकें
आगजनी की घटनाओं को रोकने के लिए हमने निर्णय लिया है कि ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में फारेस्ट फायर एवं मैनेजमेंट कमेटी बनायेंगे और पहले फेस में हमने उन 72 ग्राम सभाओं को चिन्हित किया जहां पर आग लगने की संभावना है। इस कमेटी में उसी इलाके का युवक मंगल दल का अध्यक्ष, उसी इलाके की महिला मंगल दल की अध्यक्ष और राजस्व विभाग एवं वन विभाग के कर्मचारी इसके मेंबर होंगे ताकि जहां एक ओर ग्राम प्रधान को सम्मान मिलेगा, कर्मचारियों को अध्यक्ष बनने का अवसर मिला और दूसरा कहीं न कहीं स्थानीय लोगों को अपनी जिम्मेदारी का भी अहसास होगा। हमने पहली बार फारेस्ट फायर को डिजास्टर से जोड़ने का काम किया है और जनपदों के अंदर जिलाधिकारी की अध्यक्षता में डिस्टिक फॉरेस्ट फायर एवं मैनेजमेंट कमेटी बनाई। जिसका फायदा हमें यह मिला कि रिवेन्यू विभाग के कर्मचारी भी हमें मदद करने लगे और दूसरा डिजास्टर फंड है, उससे भी हमें तुरंत पैंसा मिलना शुरू हुआ है।
सरकार से पैसा मिलने में समय लगता था लेकिन डिजास्टर मैंनेजमेंट के जो फंड डीएम के अंडर में होता है, उससे तत्काल पैसा मिल जाता है जिससे हमें मदद मिली। फारेस्ट फायर में सबसे बड़ी समस्या है रिस्पांस टाइम की है। इसीलिए हमने इसमें ग्राम सभाओं को शामिल किया है। आग लगने पर फोरेस्ट के लोग माइक लगाकार लोगों को जागरूक करने का काम न कर रहे हैं क्योंकि बिना जनजागरूता के आप किसी भी आपदा को जीत नहीं सकते। इसमें जन सहभागिता और जनजागरूता जरूरी है। हमने निर्णय लिया है कि हमारी फारेस्ट फायर एवं मैनेजमेंट कमेटी जंगल की आग बुझाने में जितना बड़ा रोल निभाएगी, उसे राज्य स्तर पर सम्मानित किया जाएगा।
पिछले वर्षों के मुकाबले इस साल कुल 20 प्रतिशत ही वनाग्नि का नुकसान

हमने हेड ऑफ फारेस्ट ने चार मीटिंग की हैं और हर डिवीजन को बजट दे दिया है। आग लगने के तीन-चार कारण प्रमुख हैं। पहला कारण कुछ शरारती तत्व आग लगाने का काम करते हैं, दूसरा किसान अपने खेत में खरपतवार को हटाने के लिए आग लगाता है और कभी- कभी वह आग जंगलों तक पहुंच जाती है, तीसरा आम आदमी अनजाने में बीड़ी, सिगरेट पीकर फेंक देता है, उससे भी आग लग जाती है। यही जनजागरण हम गाड़ियों के माध्यम से कर रहे हैं कि लोग ऐसा काम न करें जिससे कि आग लग जाये। इसके लिए हम लोगों को जागरुक कर रहे हैं।
2023-24 में विभागीय प्रयास और जनता के सहयोग से पिछले वर्षों के मुकाबले कुल 20 प्रतिशत वनाग्नि का ही हमें नुकसान हुआ है। इस वर्ष बहुत जल्दी गर्मी आ गई और काफी जगह फॉरेस्ट फायर के केसस हुए। हमें पूरा भरोसा है कि सरकार और जनसहभागिता से हम प्रभावी ढंग से आग लगने की घटनाओं से निपटेंगे। हमारी सरकार ने नीति बनाई है कि पिरूल को जनता से खरीदेगी। हमने पिरूल बेस्ट इंडस्ट्री पर फोकस किया है। इसके लिए हमने प्रति किलो 2.50 रुपये का रेट तय किया है और एक रुपये बोनस देने का निर्णय लिया है। विगत वर्ष हमने एक रुपये को दो रुपये बोनस कर दिया। जिससे लोगों को आजीविका में बढ़ोतरी हो और रोजगार भी मिले। इससे वनाग्नि की घटनाएं भी रुकेंगी और लोगों को रोजगार भी मिलेगा।


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