उत्तराखंड में बढ़ती बेरोजगारी के बीच राज्य सरकार की नीतियां एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। हाल ही में जारी लोक सेवा आयोग के भर्ती कैलेंडर ने युवाओं की उम्मीदों को झटका दिया है।
कैलेंडर में कुल 22 भर्तियों का उल्लेख तो है, लेकिन केवल 16 प्रवक्ता परीक्षाओं पर ही स्पष्टता दिखाई गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पीसीएस, लोअर पीसीएस और समीक्षा अधिकारी जैसी प्रमुख भर्तियों का कोई ठोस उल्लेख नहीं है। इन परीक्षाओं का इंतजार कर रहे लाखों अभ्यर्थी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।
सरकार की ओर से बार-बार रोजगार देने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। कार्मिक विभाग अभी भी विभिन्न विभागों से रिक्तियों का आंकड़ा जुटा रहा है, जिससे प्रक्रिया और धीमी हो रही है। यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही और समन्वय की कमी को दर्शाती है।
अप्रैल से दिसंबर तक का पूरा कैलेंडर प्रवक्ता परीक्षाओं तक सीमित रहना असंतुलित योजना को दर्शाता है। अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए यह एक बड़ा झटका है।
सरकार की प्राथमिकताओं में पारदर्शिता और समयबद्धता की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। यदि समय पर भर्तियां नहीं होंगी, तो बेरोजगारी की समस्या और गंभीर हो सकती है। युवाओं में बढ़ती निराशा सामाजिक और आर्थिक असंतोष को जन्म दे सकती है।
आवश्यक है कि सरकार सभी भर्तियों का स्पष्ट और संतुलित कैलेंडर जारी करे। साथ ही, रिक्त पदों को जल्द भरने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं। केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन से ही युवाओं का भरोसा जीता जा सकता है।
अन्यथा, बेरोजगारी का यह मुद्दा आने वाले समय में सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इस बीच, कई अभ्यर्थी वर्षों से तैयारी कर रहे हैं और उनकी आयु सीमा भी प्रभावित हो रही है।
सरकार को चाहिए कि वह भर्ती प्रक्रिया को मिशन मोड में लेकर समयबद्ध ढंग से पूरा करे। साथ ही, लंबित परीक्षाओं और परिणामों को प्राथमिकता के आधार पर घोषित किया जाए।
युवाओं के भविष्य से जुड़ी यह अनिश्चितता जल्द समाप्त होनी चाहिए। रोजगार सृजन को केवल वादों तक सीमित न रखकर ठोस अवसरों में बदलना समय की मांग है।







