उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत पर चिंतन और संवाद

उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत पर चिंतन और संवाद

अंतरराष्ट्रीय लोक कला दिवस के अवसर पर 22 अगस्त को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सहयोग से ‘उत्तराखंड की लोक संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन’ विषय पर एक प्रभावशाली संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन सुविख्यात सांस्कृतिक संस्था पर्वतीय कला केंद्र दिल्ली द्वारा संस्था अध्यक्ष सी.एम. पपनैं की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ।

‘उत्तराखंड की लोक संस्कृति का संरक्षण व संवर्धन’ विषय पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के जनपद संपदा विभागाध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार, सहायक प्रोफेसर डॉ. रैमबीमो ओडियो, आदि दृश्य विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ऋचा नेगी सहित उत्तराखंड के गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार अंचल से आए अनेक प्रबुद्ध जन, दिल्ली-एनसीआर में कार्यरत प्रोफेसर, डॉक्टर, सेवानिवृत्त अधिकारी, साहित्यकार, पत्रकार, राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त रंगकर्मी, लोकगायक-गायिकाएं तथा पर्वतीय कला केंद्र से जुड़े वरिष्ठ रंगकर्मी मौजूद रहे।

शुभारंभ और स्वागत वक्तव्य

संगोष्ठी का शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ, जिसे पर्वतीय कला केंद्र व इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा सम्पन्न किया गया। संस्था के उपाध्यक्ष व वरिष्ठ रंगकर्मी चंद्रा बिष्ट एवं महासचिव चंदन डांगी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए संगोष्ठी के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के दौरान पर्वतीय कला केंद्र के संस्थापक स्व. मोहन उप्रेती के योगदान तथा संस्था की छह दशकों की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों को वृत्तचित्र के माध्यम से प्रदर्शित किया गया।

संस्थागत कार्य और शोध निष्कर्ष

प्रो. के. अनिल कुमार ने बताया कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा उत्तराखंड की रॉक साइट्स, रामलीला मंचन, रामायण आधारित लोकनाट्यों तथा हिलजात्रा आदि पर डॉक्युमेंटेशन कार्य किया गया है। डॉ. ऋचा नेगी ने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पाए गए आदि मानव द्वारा उकेरे गए कला चित्रों तथा जैविक उत्पादों की महत्ता पर प्रकाश डाला और बताया कि स्थानीय लोगों को इनके महत्व की जानकारी नहीं है। उन्होंने उत्तराखंड की ‘ख़ुदेद’ गायन विधा के संरक्षण की आवश्यकता पर भी बल दिया।

प्रमुख वक्ताओं के विचार

संगोष्ठी में वक्ताओं ने विविध पहलुओं पर गहन विचार प्रस्तुत किए। दिल्ली विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रो. पुष्पलता भट्ट, पूर्व IRS अधिकारी रतन सिंह रावत, लोकगायक विरेंद्र सिंह नेगी ‘राही’, संगीत नाटक अकादमी सम्मानित दिवान सिंह बजेली, प्रो. गुड्डी बिष्ट पंवार, डॉ. कुसुम भट्ट, डॉ. हरि सुमन बिष्ट, लोकगायिका आशा नेगी, डॉ. नीलांबर पांडे, पत्रकार चारु तिवारी, लेखक पार्थसारथी थपलियाल आदि वक्ताओं ने लोक संस्कृति के संरक्षण हेतु गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया।

वक्ताओं ने कहा कि बोली-भाषा बची तो संस्कृति बचेगी। लोकगाथाएं व लोकगीत बच्चों को सुनाने होंगे। जौनसार बाबर क्षेत्र के लोकजीवन, पर्व, वेशभूषा, खानपान और संगीत पर आधारित वृत्तचित्र के माध्यम से रतन सिंह रावत ने स्थानीय संस्कृति की झलक प्रस्तुत की।

समस्या, सुझाव और समाधान

वक्ताओं ने उत्तराखंड में हो रहे पलायन, पांच सितारा संस्कृति के बढ़ते प्रभाव, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन पर चिंता जताई। कहा गया कि बारूद से पहाड़ तोड़कर सड़कों का निर्माण चिंता का विषय है। पारंपरिक तरीकों को अपनाकर स्थानीय लोगों को रोजगार देना होगा।

बोली-भाषा को शिक्षा में शामिल करने, लोकधुनों को डिजिटाइज करने, पहाड़ी उत्पादों को सुलभ मंडियों तक पहुंचाने, चकबंदी की जरूरत और जागर में शराब के मंचन पर रोक जैसे विषयों पर ठोस सुझाव रखे गए।

यह भी कहा गया कि होटलों व रिज़ॉर्ट्स में उत्तराखंडी कलाकारों के कार्यक्रमों का आयोजन कर लोकसंस्कृति का प्रचार और कलाकारों को आजीविका दी जा सकती है।

रचनात्मक संरक्षण की आवश्यकता

लोकगीत-संगीत व नृत्य की विभिन्न विधाएं समय के साथ बदली हैं। हजारों लोकधुनें लुप्त हो चुकी हैं क्योंकि उनका स्वर-लिपि में दस्तावेजीकरण नहीं हुआ। राग-ताल का ज्ञान जरूरी है। मोहन उप्रेती और अन्य लोक कलाकारों के योगदान को संरक्षित करने पर बल दिया गया।

संवेदनशील पहलू और सामाजिक चेतना

संगोष्ठी में कहा गया कि बच्चों को अपनी संस्कृति, बोली, खानपान, त्योहारों से परिचित कराना जरूरी है। संस्कृति को सिर्फ शोभा या परंपरा नहीं, जीवनशैली के रूप में आत्मसात करना होगा। तकनीकी शिक्षा के अभाव में अंचल के लोग पलायन कर रहे हैं। बाहर के लोग स्थानीय तकनीकी कार्यों में लगे हैं।

प्रवासी उत्तराखंडियों के लिए संदेश

कहा गया कि प्रवासी अपने पुश्तैनी गांव लौटें, वहां ठहरें, जिससे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पुनर्जीवन हो सके। युवाओं को आंचलिक साहित्य व अन्य माध्यमों से प्रेरित किया जाना चाहिए।

संगोष्ठी का समापन

अंत में पर्वतीय कला केंद्र कार्यकारिणी सदस्य डॉ. के. सी. पांडे ने अध्यक्ष सी. एम. पपनैं, सभी वक्ताओं, विभागाध्यक्षों, विद्वानों, कलाकारों और पत्रकारों का आभार व्यक्त करते हुए संगोष्ठी के समापन की घोषणा की। मंच संचालन महासचिव चंदन डांगी द्वारा प्रभावशाली रूप से किया गया।

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