Home साक्षात्कार ‘सेवानिवृत्ति मेरे लिए विश्राम नहीं, एक नए कर्म क्षेत्र की शुरुआत है’ – एयर वाइस मार्शल राजेश भंडारी
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‘सेवानिवृत्ति मेरे लिए विश्राम नहीं, एक नए कर्म क्षेत्र की शुरुआत है’ – एयर वाइस मार्शल राजेश भंडारी

एयर वाइस मार्शल राजेश भंडारी हाल ही में भारतीय वायुसेना के 'असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ (प्रोक्योरमेंट)' पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। 15 दिसंबर 1990 को भारतीय वायुसेना में कमीशंड अधिकारी के रूप में अपनी सेवा प्रारंभ की थी। उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनकी यह उपलब्धियां उत्तराखंड के लिए गर्व की बात है। हिल-मेल के संपादक वाईएस बिष्ट ने एयर वाइस मार्शल राजेश भंडारी से खास बातचीत की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश -

आप भारतीय वायु सेना में लगभग 36 वर्षों तक सेवाएं देकर असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ के प्रतिष्ठित पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। इस उपलब्धि को कैसे देखते हैं?

यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि रही है। इतने वर्षों तक राष्ट्र सेवा करने का सौभाग्य मिलना अपने आप में गर्व की बात है। असिस्टेंट चीफ ऑफ एयर स्टाफ जैसे उच्च पद तक पहुंचना मेरे माता-पिता, मेरे गुरुओं, और मेरी टीम की सामूहिक मेहनत का परिणाम है। इस यात्रा ने मुझे एक सच्चा देशभक्त और उत्तरदायी नागरिक बनने का अवसर दिया। मैं बहुत भाग्यशाली था कि मुझे तीन यूनिटों की कमान मिली – पहली यूनिट की कमान मैंने विंग कमांडर के रूप में, दूसरी की कमान मैंने ग्रुप कैप्टन के रूप में और तीसरी की कमान मैंने कमांडिंग एयर कमोडोर के रूप में एक बड़े स्टेशन की कमान संभाली। ये तीनों इकाइयां भारतीय वायु सेना की प्रीमियम उपस्कर शाखा हैं! राष्ट्रपति द्वारा विशिष्ट सेवा पदक प्राप्त करना भी मेरे लिए बड़ी उपलब्धियों में से एक है।

भारतीय वायु सेना में आपने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। आपने किन चुनौतियों का सामना किया और आप अपने पूरे करियर में किस कार्यकाल को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं?

भारतीय वायु सेना और लॉजिस्टिक शाखा में सेवा करते हुए आपूर्ति शृंखला, संवेदनशील स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता और समय पर संसाधन वितरण जैसी अनेक चुनौतियों का सामना किया। हमने तकनीकी और प्रशासनिक दक्षता से उसे पूरा किया। मेरा कार्यकाल निदेशालय ऑफ प्रोक्योरमेंट का प्रमुख रहते हुए सबसे संतोषजनक रहा, जहां हमने प्रक्रियाओं को पारदर्शी, तकनीकी रूप से सक्षम और तेज बनाया। अपनी 36 साल की सेवा के दौरान, मैंने सूडान, अफ्रीका में संयुक्त राष्ट्र शांति सेना मिशन सहित 19 से ज्यादा स्टेशनों पर काम किया है। इन सभी इकाइयों और स्टेशनों में मेरा कार्यकाल बहुत अच्छा और संतोषजनक रहा। इसके अलावा, ऑपरेशन शाखा में बहुत निकटता से और लंबे समय तक काम किया और पहले डीजी एयर ऑपरेशन के साथ स्टाफ ऑफिसर भी बना।

आपको वायु सेना में शामिल होने की प्रेरणा कहां से मिली? इस यात्रा के दौरान आपने कौन-कौन से संघर्ष देखे और उनसे क्या सीखा?

मेरे पिता जी अनुशासित जीवन जीते थे, और उनका सशस्त्र बलों के प्रति सम्मान मुझे प्रभावित करता था। वायु सेना में शामिल होने की प्रेरणा वहीं से मिली। इस यात्रा में कई बार दूरदराज स्थानों पर कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ा, किन्तु यही संघर्ष मुझे मानसिक रूप से मजबूत और नेतृत्व में सक्षम बनाते गए। मैंने सीखा कि संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, टीम भावना और सही नियोजन से उसे पार किया जा सकता है।

कृपया अपने बारे में बताइए। प्रारंभिक शिक्षा कहां हुई, परिवार में कौन-कौन हैं, और आपके परिवार ने किस प्रकार के संघर्षों का सामना किया?

मैं उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के पडिया गांव पट्टी रेक्का नामक एक छोटे से गांव से हूं। मेरे पिता रेक्का पट्टी से पहले पोस्ट ग्रेजुएट थे और बाद में उन्होंने हिमाचल प्रदेश में सिविल सेवा में प्रवेश लिया। मेरा जन्म चंबा, हिमाचल प्रदेश में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा वहीं के सरकारी विद्यालय में प्राप्त की। संसाधनों की कमी थी, लेकिन माता-पिता ने कभी हार नहीं मानी। उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्राप्त कर आगे बढ़ा। परिवार में मेरी पत्नी, बेटा भारतीय नौसेना अकादमी में प्रशिक्षण ले रहा है। बेटी डॉक्टर और दामाद भारतीय नौसेना एविएटर हैं। मेरे परिवार ने हर कठिनाई में मेरा साथ दिया, चाहे वह स्थानांतरण हो, ऑपरेशन की ड्यूटी हो या लंबी अनुपस्थिति रही हो।

हमारी पत्रिका का एक मोटो है, “एक अभियान पहाड़ों की ओर लौटने का”। आप उत्तराखंड के लिए वर्तमान में क्या कार्य कर रहे हैं और भविष्य में क्या करना चाहते हैं?

उत्तराखंड के लिए मेरा हृदय सदा समर्पित रहा है। वर्तमान में यहां के युवाओं के लिए करियर मार्गदर्शन सत्र आयोजित करता हूं। साथ ही, पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में कार्यरत एनजीओ को सहयोग करता हूं। भविष्य में योजना है कि एक टेक्नोलॉजी-प्रशिक्षण केंद्र खोलूं, जहां युवाओं को लॉजिस्टिक्स, आपूर्ति प्रबंधन और रक्षा संबंधी कौशल सिखाए जाएं। मेरी पत्नी ज्योति रावत उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के चोंडकोट पट्टी के एक छोटे से गांव गोरली से हैं। उनके पिता वन अनुसंधान संस्थान देहरादून से वरिष्ठ वैज्ञानिक के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। उनका छोटा भाई सेना में कर्नल पद पर कार्यरत है और बहन पूर्व भारतीय सेना अधिकारी है। हम सभी उत्तराखंड से बहुत करीब से जुड़े हुए हैं और अपने राज्य के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं।

सेवानिवृत्ति के बाद आपकी क्या योजनाएं हैं? आप समाज या देश के लिए किस प्रकार से योगदान देना चाहेंगे?

सेवानिवृत्ति मेरे लिए विश्राम नहीं, एक नए कर्म क्षेत्र की शुरुआत है। मैं युवाओं को अनुशासन, नेतृत्व और टेक्नोलॉजी के प्रति सजग रहने के लिए प्रेरित करना चाहता हूं। रक्षा क्षेत्र में अनुभव होने के कारण नीति निर्माण, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और पूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए योगदान देना चाहता हूं। साथ ही, विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्यान के माध्यम से भी देश की सेवा करता रहूंगा। मेरा पूरा परिवार उत्तराखंड और यहां के लोगों से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। मैं अपने राज्य के लिए बहुत कुछ करना चाहता हूं। अगर मुझे अपने राज्य के लिए काम करने का कोई मौका मिला, तो मैं को प्रसन्नता से कोई भी जिम्मेदारी स्वीकार करूंगा।

आपकी रुचि क्या–क्या हैं? आपको खाली समय में क्या करना पसंद है?

मेरी रुचि पढ़ना, सामुदायिक खेल और पहाड़ों में भ्रमण करना हैं। खाली समय में आधुनिक लॉजिस्टिक्स प्रणालियों पर लेख लिखता हूं, जिससे युवा अफसरों को मार्गदर्शन मिल सके। साथ ही, आत्मिक संतुलन के लिए ध्यान और योग को भी प्राथमिकता देता हूं। अपने देश या राज्य के लिए कुछ भी करने को तैयार हूं। मैं प्रसन्नतापूर्वक उस कार्य को करूंगा। मैंने उत्तराखंड के सभी वरिष्ठ अधिकारियों और प्रभावशाली नेताओं से उनके कार्यालयों में मुलाकात की और देश व राज्य के हित में जो भी कार्य मैं कर सकता हूं, उसके लिए अपनी सहमति दी।

आप नई पीढ़ी के युवाओं के लिए क्या संदेश देना चाहेंगे?

मेरा संदेश है, “अच्छा इंसान बनो, तकनीकी रूप से दक्ष बनो और सदैव अनुशासित रहो।” समय बदल रहा है, टेक्नोलॉजी तेजी से विकसित हो रही है। अपने ज्ञान को अद्यतन रखना अनिवार्य है। परंतु साथ ही, मानवीय मूल्यों- ईमानदारी, करुणा और सेवा भाव को कभी न भूलें। देशभक्ति केवल वर्दी पहनकर नहीं होती, अपने कार्यस्थल पर ईमानदारी और समर्पण से कार्य करना भी राष्ट्र सेवा है।

Written by
Hill Mail

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