उत्तराखंड के इतिहास में एक नया और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ने जा रहा है। जिस सपने को पहाड़ों ने 141 वर्षों तक अपनी आंखों में संजोकर रखा, वह अब धीरे-धीरे हकीकत बनने लगा है। सामरिक, धार्मिक और पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। आगामी 20 मई से इस परियोजना के तहत पहली बार ऋषिकेश से आगे पहाड़ों में रेलवे ट्रैक बिछाने का कार्य शुरू होने जा रहा है।
रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) के अनुसार सबसे पहले शिवपुरी से गूलर के बीच छह किलोमीटर लंबी रेल लाइन बिछाई जाएगी। इस कार्य में लगभग ढाई वर्ष का समय लगेगा और करीब 750 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह केवल ट्रैक बिछाने का काम नहीं, बल्कि उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का निर्माण कार्य वर्ष 2017 में शुरू हुआ था। इसके बाद वर्ष 2020 में वीरभद्र से योगनगरी ऋषिकेश तक 5.6 किलोमीटर लंबी नई रेल लाइन बिछाई गई थी। इसी दौरान ऋषिकेश-हरिद्वार हाईवे पर अंडरब्रिज और ऋषिकेश-दून मार्ग पर ओवरब्रिज का निर्माण भी किया गया। लेकिन ऋषिकेश से आगे पहाड़ों में रेल लाइन बिछाने का कार्य अब पहली बार शुरू हो रहा है।
परियोजना के तहत कुल 125 किलोमीटर लंबा रेलवे ट्रैक तैयार किया जाना है। इसमें अधिकांश हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरेगा। अब तक मुख्य और एस्केप टनल मिलाकर कुल 213 किलोमीटर सुरंगों में से 207 किलोमीटर की खुदाई पूरी हो चुकी है। वहीं मुख्य सुरंगों के 105 किलोमीटर हिस्से में से 102 किलोमीटर तक खुदाई पूरी हो गई है। अधिकारियों के अनुसार इसी वर्ष शेष सुरंगों की खुदाई भी पूरी कर ली जाएगी।
रेल विकास निगम के डीजीएम ओमप्रकाश मालगुडी ने बताया कि शिवपुरी-गूलर के बाद गूलर-व्यासी के बीच भी छह किलोमीटर तक ट्रैक बिछाया जाएगा। ट्रैक बिछाने के लिए स्थान सर्वेक्षण और डिजाइनिंग का कार्य पूरा कर लिया गया है। रेलवे का लक्ष्य हर माह लगभग छह किलोमीटर ट्रैक बिछाने का है।
इस परियोजना की सबसे खास बात यह है कि यहां “ब्लास्ट लेस ट्रैक” तकनीक का उपयोग किया जाएगा। यह पूरी तरह आरसीसी स्लैब आधारित आधुनिक तकनीक है, जिसका इस्तेमाल यूरोप, चीन और जापान जैसे देशों में हाई-स्पीड रेल नेटवर्क में किया जाता है। इस तकनीक से ट्रैक अधिक सुरक्षित, मजबूत और कम कंपन वाला होगा। परियोजना में रेलवे के उपक्रम इरकॉन इंटरनेशनल के साथ पारस और पीसीएम कंपनियां भी ट्रैक बिछाने का कार्य करेंगी।
उत्तराखंड के पहाड़ों में रेल पहुंचाने की सोच नई नहीं है। इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 1885 में पहली बार पहाड़ों में रेल लाइन के लिए सर्वे किया गया था। इसके बाद 1923-24 में देहरादून से मसूरी तक रेल लाइन बिछाने की गंभीर योजना बनाई गई थी, लेकिन उस समय की सीमित तकनीक, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और सुरंग निर्माण में हुए हादसों के कारण अंग्रेजों को योजना अधूरी छोड़नी पड़ी।
अब आधुनिक तकनीक और मजबूत इंजीनियरिंग के दम पर यह सपना साकार होने जा रहा है। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना न केवल चारधाम यात्रा को आसान बनाएगी, बल्कि पर्यटन, व्यापार, रोजगार और सामरिक दृष्टि से भी उत्तराखंड को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाएगी। पहाड़ों में ट्रेन की सीटी अब सिर्फ कल्पना नहीं, बल्कि जल्द सुनाई देने वाली वास्तविकता बनने जा रही है।







