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ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना ने पकड़ी रफ्तार, 19 में से 8 रेल पुल तैयार, दिसंबर तक कई और होंगे पूरे

उत्तराखंड की बहुप्रतीक्षित ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना तेजी से अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रही है। परियोजना के तहत बनाए जा रहे 19 रेल पुलों में से आठ का निर्माण पूरा हो चुका है, जबकि शेष 11 पुलों पर 20 से 60 प्रतिशत तक कार्य पूरा कर लिया गया है। रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) ने कई महत्वपूर्ण पुलों का निर्माण इसी वर्ष दिसंबर तक पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। परियोजना में तेजी आने से राज्य के लोगों की वर्षों पुरानी रेल कनेक्टिविटी की उम्मीदें और मजबूत हुई हैं।

ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक बनने वाली इस रणनीतिक रेल लाइन में कुल 19 पुल प्रस्तावित हैं, जिनकी कुल लंबाई 3,078.25 मीटर यानी करीब 3.08 किलोमीटर है। ये पुल गंगा, अलकनंदा, चंद्रभागा सहित कई नदियों और गदेरों को पार करेंगे तथा दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों को देश के मुख्य रेल नेटवर्क से जोड़ने का काम करेंगे। यह परियोजना पर्यटन, तीर्थाटन, व्यापार और सामरिक दृष्टि से उत्तराखंड के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

परियोजना का सबसे लंबा रेल पुल श्रीनगर गढ़वाल में अलकनंदा नदी पर बनाया जा रहा है, जिसकी लंबाई 489 मीटर है। आकर्षक डिजाइन और आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीक से तैयार हो रहा यह पुल निर्माण के दौरान ही लोगों के आकर्षण का केंद्र बन चुका है। वहीं, सबसे छोटा पुल नरकोटा गदेरे पर बनाया जा रहा है, जिसकी लंबाई 26.15 मीटर है। इसके अलावा गौचर में 341.97 मीटर, चंद्रभागा नदी पर 314.40 मीटर तथा लझनोली क्षेत्र में 276.75 मीटर लंबे पुलों का निर्माण भी तेजी से चल रहा है।

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना का शिलान्यास 9 नवंबर 2011 को तत्कालीन रेल मंत्री दिनेश त्रिवेदी और तत्कालीन रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी ने गौचर हवाई पट्टी पर किया था। भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 2016 से परियोजना का वास्तविक निर्माण कार्य शुरू हुआ। वर्तमान समय में परियोजना का सिविल कार्य लगभग 80 प्रतिशत पूरा हो चुका है, जिसमें सुरंगों, एप्रोच मार्गों, पुलों और अन्य आवश्यक संरचनाओं का निर्माण शामिल है।

अब तक देवप्रयाग क्षेत्र में गंगा नदी, श्रीनगर और गौचर में अलकनंदा नदी, चंद्रभागा, शिवपुरी, कौड़ियाला, ब्यासी और सिवाई क्षेत्रों के पुल तैयार किए जा चुके हैं। इन पुलों के निर्माण में अत्याधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग किया गया है। कंपोजिट स्टील गार्डर, अंडरस्लंग स्टील ट्रस, उच्च क्षमता वाले बेयरिंग और भूकंपरोधी डिजाइन जैसी आधुनिक प्रणालियों को अपनाया गया है, ताकि भविष्य में भूकंप, भारी वर्षा और भूस्खलन जैसी प्राकृतिक चुनौतियों के बीच भी रेल संचालन पूरी तरह सुरक्षित रह सके।

आरवीएनएल के उप महाप्रबंधक (सिविल) ओ. एस. मालगुडी ने बताया कि परियोजना के सभी 19 पुलों का निर्माण पर्वतीय भूगर्भीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आठ पुल पूरी तरह तैयार हो चुके हैं, जबकि शेष पुलों का निर्माण निर्धारित समयसीमा के अनुसार तेजी से आगे बढ़ रहा है। कई प्रमुख पुलों को दिसंबर 2026 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना पूरी होने के बाद उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में आवागमन पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान और तेज हो जाएगा। चारधाम यात्रा, पर्यटन, स्थानीय व्यापार और आपदा प्रबंधन को नई मजबूती मिलेगी। साथ ही सीमावर्ती क्षेत्रों तक बेहतर संपर्क स्थापित होने से यह परियोजना सामरिक दृष्टि से भी देश के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी। राज्य के लाखों लोगों को अब इस बहुप्रतीक्षित रेल परियोजना के जल्द पूरा होने का इंतजार है।

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Hill Mail

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